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ज्ञानवाणी-2

Tuesday, October 7th, 2008

२५ जनवरी दिन सोमवार दोपहर की वेला में पिता शिव से जीवन में चल रहे दंड भुगतने के समान वातावरण को सामान्य बनाने के लिए प्रार्थना करके आत्मिक गुणों की वृद्धि के लिए प्रार्थना की!
मुझ दीनदयालु दया के सागर कृपालु पिता की निःसंदेह उत्तमता को प्राप्त हो चुकी संतान जब कोई नई अवस्था किसी जीव को दिलवानी होती है तो परिस्थितियाँ एक दम अपना स्वरुप बदल लेती हैं,पहले जो जैसा था वह वैसा न रहकर बदला बदला सा लगने लगता है या जो पहले था वैसा रहता ही नहीं! जिस प्रकार एक पेड़ जो तानकर खडा होता है,जरा सी चिंगारी उसे राख के ढेर में बदल देती है,उस राख के ढेर को देख कर कोई नहीं कहेगा की यह एक पेड़ खड़ा है! वह तो राख बन गया,राख तो राख होती है,वह किसी भी चीज़ की हो सकती है! फिर वह बड़ा सा पेड़ जला हो या कोई शरीर! तो बच्चे इसी प्रकार जब कहीं अहंकार जलता है तो उस से जो भाव बचेंगे उस से जीव का हाल उसी विभूति के समान बनता है जो भगवान् शंकर का दिखायी देता है! अर्थात अहंकार जीव के अन्दर जलता है लेकिन जब अहंकार स्वयं जल कर राख हो जाता है तो जीव की अवस्था बदल जाती है ! जैसे राख ठंडी होकर पड़ी रहती है उसी प्रकार जीव अहंकार से शून्य हो जाता है! सो बच्चे तुम्हारा हिसाब दंड भुगतने का उसी हिसाब से है जिस प्रकार आग जला कर पेड़ को जलाया जाता है तो धरती का आश्रय लेना पड़ता है, तो तपना धरती को पड़ता है! जहाँ धरती तो मात्र आश्रय देने के लारण कष्ट भोगती है , काम तो पेड़ का हो रहा होता है, ठीक उसी प्रकार किसी जीवात्मा के अन्दर के अहंकार की समाप्ति के अवसर पर किसी न किसी आत्मा को समर्पण करना पड़ता है! सो बच्चे जब उचित वेला आती है तब कलि खिलकर अपनी महक वातावरण में बिखेर देती है! ठीक इसी प्रकार जब मुझे तुम्हारा स्वरुप जगजननी वाला बनाना था , उसका समय आ गया ,तुम्हे कुछ विशेष करने की आवश्यकता पड़ेगी ही नहीं ! जिस प्रकार गति से चल रही गाड़ी को धक्का मारने की आवश्यकता नहीं होती! सो बच्चे निरंतर चल रही जीवन की गाड़ी का मालिक मैं शक्ति रूप पिता तुम्हे सीधा उसी और खींच कर लेकर जा रहा हु जिस ओर शक्ति ओर शान्ति निवास करती हैं! तेजपुंज शक्ति स्वरूप माँ आदिशक्ति से तुम्हे नया स्वरुप शक्ति का प्रदान करवाया जाना है ! बाकी रही बात तुम्हारे मन की कष्टकारी अवस्था की, बच्चे कभी चींटी पहाड़ को गिरा पायी है! या फूँक से पहाड़ को उडाते देखा है! नहीं न! तो फिर क्यों अपना मन डावाडोल किया तुमने ! बच्चे निर-अहंकारी और निस्वार्थ भाव से जी रही उस आत्मा को अपने हिसाब से जीने दो,तुम्हे कहीं कोई अपनी राय का दाखिला करवाने की आवश्यकता नहीं! तुम्हारा स्वयं का स्वाभिमान तुम्हे उन उचाइयों पर ले जाएगा जहाँ पर अमृत विजयी बनने का गौरव प्राप्त हुआ करता है! बच्चे जिसके कुंड में जो भरा होगा अमृत या विष ,वह उसी की और लुढ़कता चला जाता है! उसे बार बार धकेलने की आवश्यकता नहीं रहती ,बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार चुम्बकीय शक्ति से लोहा स्वयं चुम्बक की तरफ़ खिचने लगता है,उसे धकेलना नहीं पड़ता ! तो बच्चे मैं पिता शक्ति स्वरुप उसी चुम्बकीय शक्ति से अपने समान गुणों वाली आत्माओ को अपनी तरफ़ खींच लिया करता हु! उन्हें अलग से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं रहती! यह सारा ब्रह्मांड इन्ही शक्तियों का भण्डार है! इसमें समाई शक्तियों को मानव शरीर के द्वारा ही खींचा जा सकता है! जिन्हें चलाने की शक्ति मानव शरीर में ही विद्यमान है! मात्र उन विधियों को अपनाना पड़ता है जिनसे शक्तियां खिंचनी प्रारंभ होती हैं! जिस प्रकार लकडियों का ढेर पडा हुआ है ,जलाने के लिए तिल्ली भी है लेकिन तिल्ली को घिसाने का जरिया माचिस न होने से आग जलाई जानी असंभव होगी, ठीक उसी प्रकार ब्रह्मांड में शक्तियां भी हैं ,उन्हें एकत्रित करने का जरिया मानवशरीर भी है ,लेकिन जब तक विशी को नहीं अपनाया जाएगा तब तक कुछ भी कर पाना असंभव होगा, सो बच्चे तुम्हे इस काम के लिए बार बार चेतावनी भी दी गयी लेकिन तुम्हे तो मूर्छा (सांसारिक प्र्वितियों का समावेश) आने लगी थी , तो मूर्छा तुम्हारी उडवानी थी इसीलिए तुम्हे इतनी जोर से झटकना और पटकना पडा की तुम्हारा मन क्षुब्ध होकर की यह तुम्हारे ही भले और कल्याण के लिए करना पडा तो काम में लगवाई गई जीवात्मा कसूर वार कैसे हुई! तुम्हे तुम्हारा काम और अवस्था याद करवाने के लिए इतना सारा बखेडा करना पडा! कसूर किसका था ,तुम्हारा या उस आत्मा का जिसे बेवजह तुम्हारा काम करना पड़ा! तो बच्चे समझो स्वयं की अवस्था को एवं तैयार हो जाओ अपने मूल रूप को पाने के किए ! तुम्हे कतई परेशान होने की आवश्यकता न पहले थी और न अब है ! तुम्हारा सारा काम पूर्णता को प्राप्त हो इसके लिए तुम्हे मन की विशमताओ के घेरे से स्वयं को निकालना होगा! अपार शक्ति की मालिक तुम आत्मा क्यो बेवजह उस अंगारे से स्वयं को झुलसाने पर अडी हो जिस अंगारे का तुम्हारे जीवन से कोई सरोकार है ही नहीं! मैं पिता तुम्हे जीवन की खुशहाली के लिए उस बगिया का एक फूल दे रहा हूँ जिस बगिया की महक स्वर्ग से भी अधिक आनंददायक हुआ करती है! बच्चे संभालो उस कृपा रुपी फूल को जिसका तुम्हारे पास आना ही तुम्हारे सौभाग्य का सूचक है! बच्चे मेरा अंश तो तुम हो ही , फिर कौन तुम्हे घिनौनी हरकतों से गिरा सकता है या तुम्हारा तिरस्कार कर रहा है! कौन तुम्हारी अवहेलना करके तुम्हे प्रताड़ना दे सकता है! बच्चे मेरी झोली में हीर मोती ही हुआ करते हैं और यही हीरे मोती मैं भेंट स्वरुप अपने बच्चों को दिया करता हूँ!तो तुम भी उन्ही हीर मोतिओं से स्वयं को सजी-सवरी समझो! एक हीरा ही जीवन को चमकाने में सक्षम होता है!तो तुम्हे तो मालिक बना दिया गया है उस हीरे की खान की , सो बच्चे स्वयं को नीच कहना तुम्हे शोभा नहीं देता ! तुम तो सर्वथा सुंदर सर्वगुण संपन्न सौभाग्य शाली वह आत्मा हो जिसे प्रदान सब कुछ किया गया होने पर भी मात्र वंचित इसलिए रखा गया की समय आने पर किवाड़ खोल दिए जायेंगे भाग्य का सूर्य उदय होगा ,चमकार निकलते ही भाग्य बदल जाएगा! चंदन के पेड़ होने पर भी जब राख के ढेर तुम्हे सौपे गए हो तो स्वयं का हिसाब राख जैसा ही तो तुम्हे लगना था ! जिस राख का कोई मोल नहीं होता उसे कौन चाहेगा! कोई नहीं! लेकिन समय बदलना तो सुनिश्चित है! फेरबदल इस प्रकार होगा की जिसे अब तक चंदन के पेडो के साए में बिठाया गया था उसे वहां से हटा दिया जाएगा और तुम्हारा अधिकार तुम्हे सौप दिया जाएगा! विदाम्ब्नाया रही अबतक की परिस्थिति की कि जो अब तक सुखो का उपभोग कर रहे थे उनके तांत्रिक विधान के हिसाब से समय का पैमाना ही ऐसा था ! लेकिन अब पैमाना पलट कर रख दिया जाएगा! अधिक गडबडी मचाने वाको कोई पहले दबोच लिया जाना है ,उसके बाद कार्यशैली के हिसाब से दंड उन्हें मिलते रहेंगे जिन्होंने काम में हिस्सा बढाया था! तो बच्चे लगन से तुम अपने आप में निश्चिंत रहो ! कीसे अपराधी को कौन सा दंड दिया जाना है यह तो भुगतने वालो की अवस्था ही बता देगी! तुम निडर बन कर जियो! डरने की तुम्हे जरूरत नहीं! तुम्हारा हिसाब संपरिवर्तन का चलने ही वाला है! उसे कोई रोक नहीं सकेगा! अपनी मर्ज़ी से भाग्य बदलने वालो की नाक में नकेल डालो देखना तुम! बच्चे समय की ही जरूरत थी जो इतना बड़ा झटका तुम्हे दिया गया!

ज्ञानवाणी-5 (1997)

Sunday, September 21st, 2008

सायं काल में अपने इष्ट देव महादेव से स्वयं को तप की उच्चतम अवस्था तक ले जा सकू इसके लिए प्रार्थना करके, जीवन के प्रति चल रहे अन्य आत्माओ के द्वारा विरोधात्मक प्रहार जिन्हें सहन कर पाना नामुमकिन होता जा रहा है तथा जीवन में हुए अन्याय को न्याय मिले, इसके लिए सबसे बड़े न्यायधीश पिता शिव से प्रार्थना की!
मुझ दीनवत्सल पिता के आज्ञाकारी बच्चे, तुम वही आत्मा हो जो अपने पूर्व जन्मो की पूँजी के बल पर अपने आने वाले कई-कई जन्मो के मार्ग अवरोधकों को हटाने की पूरी कोशिश में लगी हुई हो! बच्चे जिस प्रकार ऊँची चढाई चढ़ने वाला जीव अपने पास वे सब समान इकट्ठे करता है जिनकी सहायता से उसे हर तरह की मुसीबत का सामना करना होता है और बुद्धि की सहायता से वह उन्हें प्रयोग में लाता है,  ठीक उसी प्रकार मुझ पिता के द्वारा चलाया जा रहा जीव अपने शुद्ध मन के भावो से उच्च कर्म करते रह कर, वह पुण्य दाई राशि इकट्ठी करता है जो उसके दंड स्वरुप विघ्नों को हटाने में सहायक बनती है! सो बच्चे जो कर्म तुम करते हो या जो विघ्न तुम्हारे मार्ग में अन्य आत्माओ द्वारा खड़े किए जा रहे हैं ये तो खेल खेलने का एक तरीका ही समझो! कोई जीव अपने हिसाब से कुछ नहीं कर सकता! उस उस जीव को माँ सरस्वती के द्वारा वैसी ही बुद्धि प्रदान करवा दी जाती है जिस प्रकार का खेल मुझे खिलवाना होता है! इसी खेल में जीव के मन के भावो का समावेश होता रह कर नई नई कहानियाँ बनती रहती हैं! जीवो के मन के बुरे भाव उस कहानी को बुरा मोड़ देने वाले होते हैं! जिनका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ता ही है चाहे किसी भी रूप में! अच्छे भाव खेल पूरा होते ही जीव को बंधन मुक्त करवा देते हैं! लेकिन बच्चे यहाँ संख्या ऐसे जीवो की अधिक है जिनके मन के भाव पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण अशुद्ध हैं! उनका लेखा जोखा कई-कई जन्मो का समाप्त होने वाला नहीं है! कुछ पुण्यात्माएं पूर्व जन्मो की पूँजी के प्रभाव से अपना हिसाब पूरा करवाने में खरी उतरती हैं! इन आत्माओ को मुझ पिता द्वारा ऐसे अपना लिया जाता है जिस प्रकार खेल रहे बच्चे को घर वापिस ले जाने के लिए पिता गोद में उठा लेता है! इस समय पिता का सानिध्य, प्यार सब कुछ बच्चे पर होता है! बच्चा अगर पीछे का सब कुछ भुला कर पिता के कहने में रहेगा तो उसे सब कुछ मिल ही जाएगा! तो बच्चे तुम स्वयं को मुझ पिता की गोद में बैठे हुए समझो और जो हो चुका वह पीछे का खेल मात्र था, यथार्थ से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है अब तुम्हारा! सम्बन्ध होगा केवल उन जीवो को जिन्हें उस खेल के अनुसार दंड भुगतने पड़ेंगे! ये तो वे कांटे होते हैं जिन्हें उन्होंने अपने मार्ग में उन्होंने स्वयं बिछाया होता है और इन्हे चुगना भी मात्र उन्हें ही पड़ेगा! क्योंकि उस मार्ग पर वे ही खड़े होंगे! जिसके पैर में कांता चुभेगा उसे ही पीडा का एहसास होगा! और उसे ही दुःख भी भोगना पड़ेगा! तभी जीव को एहसास होगा अपने किए का! सो बच्चे अच्छे बुरे जो भी कर्म जीव करता है, उनका उस जीव के साथ वैसा ही सम्बन्ध रहता है जिस प्रकार अपने पिए जाने वाले पानी में तुम मीठा घोल रहे हो या कड़वाहट! अमृत घोल रहे हो या फिर विष! जो भी घुला है पीना तोह पड़ेगा ही, उस से छुटकारा नहीं हो सकता! सो बच्चे घूँट तो हर जीव हर पल भरता ही है! तभी स्वयं को सुखी या दुखी अनुभव करता रह कर वह अपनी आत्मा को उठता या गिराता है! सो बच्चे आत्मा के इसी उठाने या गिराने का हिसाब उसे न्याय के कटघरे में खड़ा करवाता है! इसमें किसी भी अन्य जीव को वह दोष नहीं लगा सकता! क्योंकि जिस पूँजी का मालिक वह होता है वही हालत उसकी आत्मा की बनती है! आत्मा को ही न्याय के कटघरे में आना पड़ता है! तो बच्चे गिरी हुई आत्मा को क्या कभी बरी किया जायेगा? नहीं! उसे उसी हिसाब से दंड सुना दिया जाएगा! फिर दंड भुगतना पड़ता भी साथ ही है! अगले जन्म का चक्कर कलियुग में नहीं होता! यहाँ साथ ही साथ कर्म, साथ ही साथ दंड और साथ ही साथ सहना होता है! सो बच्चे मुजरिम बने जीव संसारी आँखों से जो अब तक छुपते आ रहे थे वे मुझ पिता की तीसरी आँख से छुप नहीं सकेंगे! उन्हें जुर्म कबूल करके सूली पर चढाने जैसा दंड नसीब होगा! अब तक ना भागते तो शायद सूली के दंड से बच भी सकते थे! लेकिन होनी बलवान होती है! पूर्व जन्मो में राजा के घर नौकर होने से चोरी कर करके अपने मिलने वालो के घर भरे थे इन्होने सो वे वापिस लेने में लगे हुए हैं ये अब तक! अब हिसाब पूरा होने वाला है! न्याय का पलडा अवश्य झुकेगा! सो बच्चे पाप रुपी गाँठ को प्रायश्चित रुपी नोक से खोलने वाला जीव अवश्य अपना दंड कम करवा लेता है लेकिन उसे और भी मजबूत करने वाला एक न एक दबोचा ही जाता है! तुम्हे अपना काम याद रखना है ।बाकी के काम समय के अनुसार तुम्हे पूरे होते नज़र आयेंगे! तुम्हे अपने मार्ग में नज़र आ रहे जीवो के अवरोधों को अपने तपोबल से नष्ट करना होगा! इसके लिए कुछ विशेष नहीं करना होता! सेक के आगे कीट पतंगे अधिक देर तक टिक नहीं पाते उसी प्रकार मुझ पिता की कृपा प्राप्त आत्माएं भी उसी लौ की समान बन जाती है जिन्हें जगत की अन्य आत्माएं पार नहीं कर पाती! सो बच्चे मेरी नज़र में ऐसी आत्माओं का कोई मोल नहीं होता जो अन्य आत्माओ को कष्ट पहुचाती हैं! ऐसी आत्माएं उन जुगनुओं के समान होती हैं जो अंधेरे में चमकती अवश्य हैं परन्तु अन्य जीव आत्माओ को रौशनी नहीं दे सकती! और कुछ समय के बाद अपना अस्तित्व खो बैठती हैं! बच्चे तुम्हे अपनी योग शक्ति को बढ़ाना है इसी से सारे काम होंगे!

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