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दृद -संकल्प, तप और इश्वर प्राप्ति

Friday, March 6th, 2009
मुझ परमज्योति एवं बिन्दु स्वरुप शिव का अपने बच्चों को आशीर्वाद!अग्नि जिस प्रकार अपना सेक अधिक फैलाकर अन्य वस्तुओं को भी गर्म करके अपने वहां होने का एहसास दिलाती है ठीक उसी प्रकार तुम आत्मा की मुझ पिता से लग्न अपना एहसास अन्य आत्माओं को इस ज्ञानवाणी के ज्ञान से करवाते रह कर मेरी उपस्थिति का एहसास करवाती है ! बच्चे सेक में जैसे हर कोई एक सा आनंद अनुभव नहीं करता ,उसी प्रकार ज्ञान प्राप्ति की इच्छा या उस से आनंद सभी को एक सा प्राप्त हो यह नहीं हो सकता ! सो बच्चे मुझ पिता की कृपा वैसे तो सब जीवो को प्राप्त हो रही है लेकिन उस कृपा को कई गुना बढ़ा कर कौन उसे प्रयोग करता है यह जीव की मेहनत एवं आस्था के ऊपर निर्भर करता है! बच्चे! आस्था भी बहुत से जीवो की बहुत होती है लेकिन मेहनत अपनाना हर जीव के द्वारा बन सके ऐसा होना असंभव होता है! सो मेहनती बच्चो को अलग चुन लिया जाता है! उनसे मेहनत करवाते रहकर उनकी आस्था और मेहनत बढती रहे,इसके लिए प्रयास जारी रहता है !इस प्रयास में बच्चों को उसके मार्ग पर चलते-२ कुछ देर के बाद धक्का देकर देखा जाता है की उसके पाव कितने मजबूत हैं! माना अचानक धक्के से उसके पाव डगमगा गये भी तब भी वह दोबारा वापिस ख़ुद को उसी स्थान पर लाने में प्रयास किस हिसाब से करता है! स्वयं की मेहनत उसके द्वारा कितनी बढती है! इस प्रयास में वह कितना तड़पता है मुझ पिता से मिलने के लिए ! सो बच्चे स्वयं को उसी हिसाब से गिरी पड़ी जानो! मुझ पिता को दोबारा पाने के लिए तुम स्वयं को कितना प्रयास करवाती हो यही अब मुझ पिता द्वारा देखा जाना है ! बच्चे यहाँ मानसिक चोट भी लगी ,गिराया भी गया और दुःख भी सहना पड़ा ! फिर ऊपर उठने के लिए उस चोट का दर्द सहन करके भी ,स्वयं को चलाना पड़ता है बिना किसी के सहारे के ! सो बच्चे, अपनी मानसिक स्थिति को वही चोट के दर्द का एहसास समझो !तुम्हारा दृद्द-संकल्प ही तुम्हारा साथी है ! उसका सहारा तुम्हे शक्ति प्रदान करेगा ऊपर चढ़ने के लिए ! इसके बिना तो स्वयं को गिरी हुई ही जानो! सो बच्चे, आज का तुम्हारा भाव मुझ पिता के प्रति अपनी तड़प का , तुम्हे यही प्रेरणा दिलवाता है कि आज,अभी इसी वक़्त तुम्हारा दृद संकल्प तुम्हारा भाव बनना चाहिए! मुझ पिता की शरण तो तुम्हारे भावो को आधार बनाने से ही प्राप्त होगी ! सो बच्चे, कठोर तप का श्रेय तुम्हारी आत्मा को मिले ,इसके लिए तप का व्रत धारण करो!तुम्हारा प्रत्येक दिन ,प्रत्येक घडी ,प्रत्येक पल व्रत संलिप्त होना आवश्यक है ! मुझ पिता की प्रत्येक वस्तु की अधिकारिणी तुम स्वयं बन जोगी ! मुझ पिता के लिए छोडा गया अन्न का एक दाना कई करोड़ गुना फलदायक होता है ! अपनी निष्ठां इसी में समझो कि पिता की शरण में जाने से पहले अपना सब भार पिता के प्रति समर्पित करना है ! भार से हलके होकर ऐसे तप होगा के बस वायु में उड़ने लायक बन सकोगे ! सो बच्चे जलचर से थलचर और नभचर तुम्हे बनाना है ! जलचर को कोई भी निचे ही डुबो सकता है और थलचर को बाँध कर रख सकता है पर नभचर बनना तुम्हे मुक्त बना देगा ! बस यही प्रयास करना है !
 
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ज्ञानवाणी-3(1996)

Tuesday, October 14th, 2008

९ मई १९९६ दिन गुरूवार दोपहर के अन्तिम प्रहर में अपने परम पिता शिव परमात्मा संग मिलन मनाकर अत्यन्त आनंद की अनुभूति करते हुए जीवन के शेष लम्हों का प्रयोग जीवन को सार्थक बनाने में लाभकारी सिद्ध हो ,इसके लिए अत्यन्त उपयोगी,लाभकारी,अत्यन्त सहायक शुद्ध वातावरण,एवं सहयोगी परिस्थितियाँ प्राप्त हो यही प्रार्थना मुझ आत्मा की परमात्मा से है!

सुनो मेरी बच्ची, कलियाँ फूलो की पहले खिलती हैं,वे ही फूल बनती हैं,उन्हें अलग से किसी विशेष हवा या पानी की आवश्यकता पड़े ऐसा नहीं होता! कली बन गयी है डाली पर तो फूल तो आएगा ही, ऐसा विश्वास माली को हो जाता है! माली का काम तो डाली की रक्षा करने का होता है! अधिक तेज़ वर्षा, आंधी ,रोग -कारक कीटाणु कली को नष्ट कर सकते हैं, इन्ही को ध्यान में रखते हुए कब,कैसे कली को बचाया जा सकता है,यह चिंता माली हर समय करता है! सो बच्चे संसार में रहते हुए किस-किस बात का भय तुम्हे हो सकता है,उसे दूर करने की चिंता भी मुझ पिता को है! उसका सामान अलग से तैयार कर दिया गया है! तुम्हारी हर तड़प ,परिस्थियों को संभालने के लिए मुझ पिता से प्रार्थना करने का ये भाव ही तुम्हे उस वातावरण को दिलवा देंगे जिसमें मुझ पिता की अनुकम्पा , पवित्रता की योग एवं द्यानावास्था तुम्हे प्राप्त होगी! सो बच्चे मिटटी और पानी तो पौधे के लिए वही रहता है, मात्र निगरानी माली की बढ़ जाती है!सो उस हिसाब से तुम्हे अधिक संभालना मेरा काम है!अब आती है बारी जीवन की परिस्थितियों को बदलने की!बच्चे अधिक आंधी आएगी जीवन में तो तुम ग्रस्त होगी ! उस आंधी से जो असर तुम पर होगा ,उसका बुरा प्रभाव आत्मा पर मन के जरिये होगा ! लेकिन उसी आंधी के ना आने का इंतजाम हो तो मुझे करना है , वह ही कर दिया है समझो ! दिन -दुगनी रात चौगुनी उन्नति तुम्हारी होगी अपने क्षेत्र में ! नित्य नए परिधान पहन कर वातावरण तुम्हारे सम्मुख पेश होगा ! मेरे बाग़ की सुन्दर कली तुम आत्मा बहुत जल्दी सुन्दर फूल बन कर तैयार हो जोगी ! तुम्हे तो बस खिलना है यही तुम्हारा काम है , बाकी के काम तो मुझ बाग़ के मालिक के हैं जो माली बन कर तुम्हे संभाले हुए है ! मेरे बाग़ के फूल अत्यंत सुन्दर हो यही मेरी इच्छा है ! बाकी रही तुम जीवात्मा के भावो की बात कि समय पर जप -तप -भजन -पूजा -ध्यान कुछ नहीं होता ! बच्चे यहाँ किसी बिगडैल बच्चे को सुधारने का काम तो हो नहीं रहा , यहाँ तो स्वयं का सुधार करने कि चिंता कर रहे बच्चे का हिसाब है ! तो बच्चे तुम निश्चिंत भाव से जो हो रहा है , जैसा हो रहा है उसी में मगन रहो ! स्थिति स्वयं बनती रहेगी ! लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए अपने हर लम्हे को एक कीमती तोहफा मुझ पिता की और से मिलता समझो ! तोहफे की कदर तो एक साधारण सामान से ज्यादा होती है ! उसी हिसाब से अपने प्रिय तोहफे को सदुपयोग करना है उसकी कदर करते रहो !तुम्हारा आने वाला समय इन्ही तोहफों के कारण स्वर्णिम बन जाएगा ! किसी धनवान की गरिमा उसे अन्दर से गन्दा कर देती है लेकिन जिसके पास मुझ पिता के तोहफे रुपी धन का अम्बार लग जाता है ,वह तो राजा बन जाता है ! सो बच्चे राजा की भाँती स्वयं को तक्दीरवान समझो की हर पल धन की वर्षा तुम्हारे ऊपर हो रही है ! धन भी वह जिसका हर कोई हकदार भी नहीं हो सकता ! सो बच्चे पूर्वजनम के राजा को इस जनम में भी राजा बनाना था ,इसीलिए राह बना दी गयी ! अब खजाने को बढ़ाना और उस से अन्यों का पालन करना तुम्हारा कर्तव्य होना चाहिए ! बच्चे करम की परिभाषा को ध्यान में रखते हुए उसका स्वरुप अति दर्शनीय बनाओ ,ये करम तुम्हारी भावनाओ के प्रतीक होंगे ,इन्ही का फल तुम्हे इनाम के तौर पर दिया जायेगा ! सौ शुभ कर्मों का फल एक गौ दान के बराबर होता है ! तो तुमने कितनी गौ दान करनी हैं यह सोच कर समय को संभालो !सौ गौ दान करने से एक अश्वमेघ यज्य का फल मिलता है ! एक अश्वमेघ यज्य में पूर्व जन्मों तथा इस जनम के लिए बुरे करम – दोषों का फल स्वयं स्वाहा हो जाता है ! जब कोई पाप फल शेष नहीं रहेगा ,फिर कोई परिस्थिति गलत कैसे हो सकती है ! सो बच्चे स्वयं को दंड से बचाने वाले तुम ही होते हो ! मुझे अपना हर बच्चा उतना ही प्रिय होता है जितना प्रिय बच्चे को अपने शरीर का हर अंग होता है ! तो तुम्हारी सुरक्षा तुम्हारे से करवा कर मैं खुश होता हूँ ! तो सुनो मेरी प्रिय बच्ची , जिस प्रकार एक पिता पूरे परिवार की पालना करता है ,फिर पल करके बच्चे बड़े होकर अपने -अपने बच्चों की पालना करें , ठीक उसी प्रकार मुझ pita की चिंता का विषय बनता है कि कब बच्चा तैयार हो और अन्य बच्चों की पालना करे , जिस से और बच्चों की पालना का काम आगे चलता रहे ! सो इसके लिए अनेकों आत्माएं अलग -अलग तरीके से काम में लगा दी गयी हैं ! तुम आत्मा भी अपने करम को बढावा देने के लिए दिन -रात मुझ पिता से प्रार्थना करती हो ! लेकिन बच्चे जो रोग कई -2 जन्मों के दोषों के फल स्वरुप जीव भुगत कर दुखी हो रहे होंगे ,उनके निवारणार्थ तुम्हे नियुक्त किया जा चूका है ! यह काम बाह्य एवं आंतरिक , दो विधियों से चल रहा है ! अत्यंत गुप्त रूप से चलने वाले इस काम को निष्काम भाव से करने का संकल्प तुम आत्मा करके अपना जीवन सुखद बनाओ ! दो -चार घडियां जीवन की शेष रह गयी हैं ,इन्हें मजबूत करके अपने पल -पल का हिसाब बढाते रहो ! वातावरण अत्यंत सुखद तुम्हे प्राप्त होगा मुझ पिता का वादा है ! राजवैद की भाँती पालकी की सवारी करते रह कर हर आत्मा को दुःख -निवारण औषधि वितरित करते रहो !

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