Archive for the ‘ ज्ञानवाणी (1996) ’ Category

प्रार्थना के विभिन्न भाव और ईश्वरीय सहायता का मार्ग प्राप्त करना

Thursday, July 2nd, 2009

सुनो मुझ बिंदु के सामान दिखाई देकर तुम्हारी पालना कर रहे शक्ति स्वरुप पिता के बच्चों, इस नश्वर संसार में तुम अपने कर्मो का उपभोग करते हुए मुझ पिता से शक्ति ग्रहण करते हुए अपनी याचना मुझ तक पहुचाते रहे हो! एक याचना क्षमा के लिए तुम करते हो जब दंड तुम्हे मिल रहा होता है,मार मारने वाले से बचना होता है तुम्हे! दूसरी याचना तुम्हारी उस समय की होती है जब अन्य संसारी जीवो को मार खाते देखते  हो तो स्वयं उस मार का भागी न बनना पड़े , इसलिए तुम्हारे द्वारा प्रार्थना रुपी याचना होती है! तो बच्चों , मैं तो दाता  हूँ, जो जैसी प्रार्थना करेगा उसे वैसी ही बुद्धि प्रदान करवा दूंगा जिस से कर्म उसके उसी हिसाब से बनते रहे! तो बच्चे एक प्रार्थना उन जीवो की होती है जो संसार में रहते हुए भी संसारी नहीं बनना चाहते! इन जीवो की प्रार्थना आत्मा के उद्धार की ही रहती है! जिसमें आत्मा को उच्च दर्जा मिलने वाली बात बार-२ दोहराई जाती है! इन आत्माओ की श्रेणी बिलकुल अलग होती है,इनके कर्म बिलकुल अलग होते हैं! इनका जीवन सामान्य दीखाई देते हुए भी सामान्य नहीं होता! संसार के हिसाब से ये संसार में रहते अवश्य हैं लेकिन इनके कर्म उच्च दर्जे के होने से इन्हें शक्ति प्राप्त होती है अर्थात योग प्राप्त होता है! ये योगी की उपाधि ग्रहण किये होते हैं! संसारी जीव भुगतने वाले भोगी कहलाते हैं और ये जीव योग युक्त योगी कहलाते हैं! तो भी भोगी जीव को दंड का सामना करना पड़ता है! इसलिए दंड से बचने के लिए अनेलो उपाय प्रदान किये जाते हैं! लेकिन योगी जीवो को जो बुद्धि प्रदान की जाती है वह तो उस हिसाब से होगी जिसमें उन्हें परमयोगी की उपाधि प्राप्त हो सके,इसके लिए विशेष प्रकार के उच्च कर्म ही उनसे करवाए जाने होते हैं! इन विशेष कर्मो की श्रृंख्ला “मानस कर्मो” की होती है अर्थात मन की शुद्धि होती रहे एवेम शुद्ध कर्म बनते रहे जिनका उपयोग परोपकार के लिए होता रहे! सो बच्चे मात्र “मन की शुद्धि” ही बनी रहेगी तो स्वच्छ एवेम शुद्ध कर्म बनते रहेंगे ही!  मन की शुद्धि का असली उपाय मुझ पिता से शक्ति ग्रहण करना ही बनता है ! मार्ग तय करते हुए अपने आस-पास के वातावरण से स्वयं प्रभावित न होते हुए अपने कर्मो के बल से अन्यों को प्रभावित करना होता है तुम बच्चों को! तुम्हारा मन का सम्बन्ध आत्मिक होना जरूरी है! संसारी जीव तो इच्छाओं के बोझ के टेल दब कर अपना मार्ग तय करते हैं लेकिन तुम्हारा बोझ तो स्वयं मैंने उठा लिया है,तुम्हे तो मात्र मन का योग ही मेरे साथ बनाए रखना होगा ! बेघर बच्चे जहाँ से जो प्राप्त होगा उसे उठाने के लिए लालायित होते रहेंगे लेकिन जिन बच्चों को मेरे पास घर पहुचना ही है वे तो घर पहुचने की जल्दी में ,जो भी उनके पास है उसे भी उतार फेंकते रहेंगेओर बोझ से मुक्त होकर जल्दी मुझ से मिलन मनाने के लिए बेचैन रहेंगे! सो बच्चे यही हालत तुम आत्मा की है! तुम स्वयं को मुझ तक पहुच सकने में सक्षम समझो. तुम्हारा हर पल का हिसाब मुझे प्राप्त हो रहा है! जो हो रहा है ठीक है,जो होगा ठीक होगा,निश्चिंत रहो!

ज्ञानवाणी-3(1996)

Tuesday, October 14th, 2008

९ मई १९९६ दिन गुरूवार दोपहर के अन्तिम प्रहर में अपने परम पिता शिव परमात्मा संग मिलन मनाकर अत्यन्त आनंद की अनुभूति करते हुए जीवन के शेष लम्हों का प्रयोग जीवन को सार्थक बनाने में लाभकारी सिद्ध हो ,इसके लिए अत्यन्त उपयोगी,लाभकारी,अत्यन्त सहायक शुद्ध वातावरण,एवं सहयोगी परिस्थितियाँ प्राप्त हो यही प्रार्थना मुझ आत्मा की परमात्मा से है!

सुनो मेरी बच्ची, कलियाँ फूलो की पहले खिलती हैं,वे ही फूल बनती हैं,उन्हें अलग से किसी विशेष हवा या पानी की आवश्यकता पड़े ऐसा नहीं होता! कली बन गयी है डाली पर तो फूल तो आएगा ही, ऐसा विश्वास माली को हो जाता है! माली का काम तो डाली की रक्षा करने का होता है! अधिक तेज़ वर्षा, आंधी ,रोग -कारक कीटाणु कली को नष्ट कर सकते हैं, इन्ही को ध्यान में रखते हुए कब,कैसे कली को बचाया जा सकता है,यह चिंता माली हर समय करता है! सो बच्चे संसार में रहते हुए किस-किस बात का भय तुम्हे हो सकता है,उसे दूर करने की चिंता भी मुझ पिता को है! उसका सामान अलग से तैयार कर दिया गया है! तुम्हारी हर तड़प ,परिस्थियों को संभालने के लिए मुझ पिता से प्रार्थना करने का ये भाव ही तुम्हे उस वातावरण को दिलवा देंगे जिसमें मुझ पिता की अनुकम्पा , पवित्रता की योग एवं द्यानावास्था तुम्हे प्राप्त होगी! सो बच्चे मिटटी और पानी तो पौधे के लिए वही रहता है, मात्र निगरानी माली की बढ़ जाती है!सो उस हिसाब से तुम्हे अधिक संभालना मेरा काम है!अब आती है बारी जीवन की परिस्थितियों को बदलने की!बच्चे अधिक आंधी आएगी जीवन में तो तुम ग्रस्त होगी ! उस आंधी से जो असर तुम पर होगा ,उसका बुरा प्रभाव आत्मा पर मन के जरिये होगा ! लेकिन उसी आंधी के ना आने का इंतजाम हो तो मुझे करना है , वह ही कर दिया है समझो ! दिन -दुगनी रात चौगुनी उन्नति तुम्हारी होगी अपने क्षेत्र में ! नित्य नए परिधान पहन कर वातावरण तुम्हारे सम्मुख पेश होगा ! मेरे बाग़ की सुन्दर कली तुम आत्मा बहुत जल्दी सुन्दर फूल बन कर तैयार हो जोगी ! तुम्हे तो बस खिलना है यही तुम्हारा काम है , बाकी के काम तो मुझ बाग़ के मालिक के हैं जो माली बन कर तुम्हे संभाले हुए है ! मेरे बाग़ के फूल अत्यंत सुन्दर हो यही मेरी इच्छा है ! बाकी रही तुम जीवात्मा के भावो की बात कि समय पर जप -तप -भजन -पूजा -ध्यान कुछ नहीं होता ! बच्चे यहाँ किसी बिगडैल बच्चे को सुधारने का काम तो हो नहीं रहा , यहाँ तो स्वयं का सुधार करने कि चिंता कर रहे बच्चे का हिसाब है ! तो बच्चे तुम निश्चिंत भाव से जो हो रहा है , जैसा हो रहा है उसी में मगन रहो ! स्थिति स्वयं बनती रहेगी ! लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए अपने हर लम्हे को एक कीमती तोहफा मुझ पिता की और से मिलता समझो ! तोहफे की कदर तो एक साधारण सामान से ज्यादा होती है ! उसी हिसाब से अपने प्रिय तोहफे को सदुपयोग करना है उसकी कदर करते रहो !तुम्हारा आने वाला समय इन्ही तोहफों के कारण स्वर्णिम बन जाएगा ! किसी धनवान की गरिमा उसे अन्दर से गन्दा कर देती है लेकिन जिसके पास मुझ पिता के तोहफे रुपी धन का अम्बार लग जाता है ,वह तो राजा बन जाता है ! सो बच्चे राजा की भाँती स्वयं को तक्दीरवान समझो की हर पल धन की वर्षा तुम्हारे ऊपर हो रही है ! धन भी वह जिसका हर कोई हकदार भी नहीं हो सकता ! सो बच्चे पूर्वजनम के राजा को इस जनम में भी राजा बनाना था ,इसीलिए राह बना दी गयी ! अब खजाने को बढ़ाना और उस से अन्यों का पालन करना तुम्हारा कर्तव्य होना चाहिए ! बच्चे करम की परिभाषा को ध्यान में रखते हुए उसका स्वरुप अति दर्शनीय बनाओ ,ये करम तुम्हारी भावनाओ के प्रतीक होंगे ,इन्ही का फल तुम्हे इनाम के तौर पर दिया जायेगा ! सौ शुभ कर्मों का फल एक गौ दान के बराबर होता है ! तो तुमने कितनी गौ दान करनी हैं यह सोच कर समय को संभालो !सौ गौ दान करने से एक अश्वमेघ यज्य का फल मिलता है ! एक अश्वमेघ यज्य में पूर्व जन्मों तथा इस जनम के लिए बुरे करम – दोषों का फल स्वयं स्वाहा हो जाता है ! जब कोई पाप फल शेष नहीं रहेगा ,फिर कोई परिस्थिति गलत कैसे हो सकती है ! सो बच्चे स्वयं को दंड से बचाने वाले तुम ही होते हो ! मुझे अपना हर बच्चा उतना ही प्रिय होता है जितना प्रिय बच्चे को अपने शरीर का हर अंग होता है ! तो तुम्हारी सुरक्षा तुम्हारे से करवा कर मैं खुश होता हूँ ! तो सुनो मेरी प्रिय बच्ची , जिस प्रकार एक पिता पूरे परिवार की पालना करता है ,फिर पल करके बच्चे बड़े होकर अपने -अपने बच्चों की पालना करें , ठीक उसी प्रकार मुझ pita की चिंता का विषय बनता है कि कब बच्चा तैयार हो और अन्य बच्चों की पालना करे , जिस से और बच्चों की पालना का काम आगे चलता रहे ! सो इसके लिए अनेकों आत्माएं अलग -अलग तरीके से काम में लगा दी गयी हैं ! तुम आत्मा भी अपने करम को बढावा देने के लिए दिन -रात मुझ पिता से प्रार्थना करती हो ! लेकिन बच्चे जो रोग कई -2 जन्मों के दोषों के फल स्वरुप जीव भुगत कर दुखी हो रहे होंगे ,उनके निवारणार्थ तुम्हे नियुक्त किया जा चूका है ! यह काम बाह्य एवं आंतरिक , दो विधियों से चल रहा है ! अत्यंत गुप्त रूप से चलने वाले इस काम को निष्काम भाव से करने का संकल्प तुम आत्मा करके अपना जीवन सुखद बनाओ ! दो -चार घडियां जीवन की शेष रह गयी हैं ,इन्हें मजबूत करके अपने पल -पल का हिसाब बढाते रहो ! वातावरण अत्यंत सुखद तुम्हे प्राप्त होगा मुझ पिता का वादा है ! राजवैद की भाँती पालकी की सवारी करते रह कर हर आत्मा को दुःख -निवारण औषधि वितरित करते रहो !

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