आत्मिक गुणों का महत्त्व और उनका अपने जीवन में उपयोग किस प्रकार हो
सुनो मुझ पिता से मंगल मिलन मना कर जीवन के अन्दर छाये अन्धकार के बारे एवं उसके निराकरण करवाने हेतु प्रार्थना कर रहे मेरे सच्चे बच्चे, जब कोई ज्ञानवान बच्चा सच्ची राह पर चलकर अपना और अन्य आत्माओं का कल्याण करना चाहता है तो वह बच्चा मेरे घर का वह अधिकार प्राप्त कर लेता है जिसे न जाने कितनी सीढियां मैंने पार करवा देनी होती हैं ! बच्चे सच्चा रास्ता हर किसी को प्राप्त नहीं होता,इसकी डगर कठिन होती है! जब तक बच्चे को राह दिलवानी होती है तब तक तो उसे अनेको सुगम रास्ते प्राप्त हो जाते हैं, जिन रास्तो पर उन्हें राह दिखाने वाले भी अनेको मिल जाते हैं, लेकिन जब जीव उस राह पर पहुचता है जो पहुचती है सीधे मुझ तक! तब सब कुछ छूट जाता है, अकेले जीव को अपनी आत्मा के गुणों के आश्रय के सहारे चलना पड़ता है! यहाँ केवल आत्मिक गुण ही संगी होते हैं, ये ही साथी होते हैं! इस राह में फूल पर भंवरे की तरह मंडराते हुए अवगुण आत्मिक गुणों का हनन करने के लिए आते हैं! अगर आत्मिक गुणों में शक्ति अधिक हुई तो अवगुणों को पास भी नहीं फटकने देगी! यहाँ जीवात्मा की जीत हुई कही जाएगी! लेकिन आत्मिक गुणों कि कमी होने पर अवगुणों का मुकाबला आत्मा नहीं कर पाएगी! अवगुण गुणों पर हावी होंगे और जीवात्मा की हार कही जाएगी! तो बच्चे किस दौर से गुजर चुके हो और किस दौर में से गुजर रहे हो, देखो! मन का संताप तुम्हे तडपा चुका है और कौन सा तडपा रहा है! संताप पैदा हुआ तो कहाँ से! कमी किसकी थी,तुम्हारी या तुम्हारे संताप के कारण की! बच्चे कमी तो तुम्हारी ही रही थी! क्यूंकि वार करने वाले की जीत हुई वह बलशाली था! तुम्हारे आत्मिक गुण प्रबल न होने से वे वार को सहन नहीं कर पाए! अब सुनो असली बात, आत्मिक गुण बलहीन क्यों हुए! बच्चे, १ और १ ग्यारह कहे जाते है! २ और २ बाईस बन जाते हैं, मात्र १ को अपने सामान १ की ही आवश्यकता पड़ती है स्वयं को ११ कहलवाने के लिए ! उसे २ या ३ को ढूँढने की आवश्यकता नहीं पड़ती! मात्र अपने सामान को ढूँढा और अपनी शक्ति बढा ली! बच्चे ठीक इसी तरह आत्मिक गुणों की बढौतरी का हिसाब है! अपने समान गुणों की ही तलाश करनी है, बस बन गयी बात! आत्मा के गुणों का पिटारा मना तुम्हारे पास है! तुमने आज तक क्या किया, अपने गुण बढाने का प्रयास कम, दुसरो के अवगुण ढूंढ कर उनके अवगुणों का दुष्प्रभाव अपने गुणों पर करवाया! मान लिया, दुसरे के अवगुण अत्यंत भारी थे, थे तो उसके लिए थे , तुमने बेमतलब उस से अपने अवगुणों को क्यों पिटवाया! राक्षस बाहर निकलेंगे ,हुडदंग मचाएंगे ही,उन्हें बाहर निकलने के लिए प्रेरित किसने किया,तुमने,ललकारा किसने,तुमने! तो पिटाई किसकी होगी,तुम्हारी ही तो होगी! क्यूंकि पहले दहाड़े भी तुम! तुम्हारी हार में कसूर तुम्हारा स्वयं का है, किसी और का है ही नहीं! तो बच्चे गाँठ बाँध लो आज से की किसी के मलबे में हाथ मरना नहीं! कोई कीचड से सना है तो उसे हो न हो,तुम्हे क्या! तुम क्यों अपने आप को उस कीचड से सनवा रहे हो! बच्चे आजमा कर देख लेना,अपने किसी एक भी गुण से दुसरे जीव के गुण कुरेदोगे तो तुम्हारे खाते में उस गुण की बढौतरी होती चली जाएगी जो भी जीव तुम्हारे संपर्क में आये, उस के गुणों का खाता अपने गुणों में मिलाने का प्रयास प्रारभ कर दो! स्वागत करो उसका अपने सद्गुणों से! उड़ेल दो अपने सारे गुण उस पर! फिर देखना कैसे दो गुणों होकर तुम्हे वे सारे गुण वापिस मिल जायेंगे! अवगुण फेंकोगे तो दो गुने होकर वापिस मिलेंगे! गुण फेंकोगे तो गुण दो गुना होकर वापिस मिलेंगे! दूसरी जीवात्मा तुम्हारा तिरस्कार कर ही नहीं सकती! वह तो तुम्हारी सौगात को दो गुना करके वापिस कर रही है! भेंट तो तुम्हारी ही कूड़ा-कबाड़ है तो फिर दुसरे को दोष कैसा! वह तो मजबूर है भेंट का हिसाब भेंट के अनुरूप ही देना है! १ और १ ग्यारह करने है! सो बच्चे चिंता की आवश्यकता नहीं! अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा! समय और सामग्री दोनो तुम्हारे पास है! आज से अभी से अपने गुण रुपी फूलो से हार तुम्हे तैयार करने हैं,और उन हारो को स्वयं सजाना है! अर्थात आत्मा की सुन्दरता बढानी है! अब यह काम भी तुम्हारा है, करना भी तुम्हे समय रहते है! उसका लाभ भी तुम्हे ही होगा और में क्लास के न. १ बच्चो में तुम गिने जाओगे! अब आज से १०८ आत्माओं का संगम अपनी आत्मा के साथ करना है तुम्हे यह सोच कर एक-२ हार सज़ा कर अपनी आत्मा को देना है! यही मुझे उपहार होगा तुम्हारी तरह से इस जीवन का !बच्चे सोच लो दूसरी आत्मा के गुण कैसे कुरेदोगे!कुदाली किसे बनाओगे! बच्चे जो गुण तुम्हे चाहिए अपने गुण की ही कुदाली बना लो! और बटोर लो जितना बटोर सकते हो! एक से ही पूर्ती में संतुष्टि न मान कर जहाँ से भी जिस भी जीवात्मा से जो भी गुण मिले उसे बटोरने का प्रयास करो! तुम्हे अधिक प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्यूंकि जिसके पास विनम्रता और त्याग नाम के गुण हैं ये तो उस फाली का काम करते है कि आत्मिक भंडारों के खजाने स्वयं तुम्हारे सामने आ जायेंगे! जहाँ गुणों के भण्डार की खाने तुम्हारे साथ हो,लेकिन जिनके मुह उलटी तरफ हो जहाँ तक तुम्हारा पहुचना ही नहीं बन रहा हो,या वहाँ पहुचने के लिए रास्ता तुम्हे नज़र नहीं आ रहा हो, यह काम मेरे सपुर्द कर दो! इसमें मुझ पिता के बताये गये नियमों का पालन मात्र करने से पथरीली चट्टानें भी पिघल जाया करती है और गुण लावे के रूप में बहने लगते हैं! सो बच्चे काम तुम्हे बता दिया गया है! है भी आसान! चाहे कही से भी, कैसे भी मात्र गुणों का संचय करना है! १०८ आत्माएं अपने संपर्क में मिलना संभव हो सके, तैयार करनी हैं! किसको कैसे अपने गुणों को सवारना है, यह देखो! जो भी आत्मा तुम्हारे संपर्क में है उसे खोना नहीं! हर किसी को कुछ न कुछ भेंट स्वरुप देना ही है! चाहे वह आत्मिक संपत्ति हो या भौतिक! बात तो काम शुरू करने से है! आखिर बात तो आत्मिक कार्य तक ही पहुचेगी! सो बच्चे आज से गिनती १०८ की १ से शुरू कर दो! दूसरा क्या भूल कर, तुम स्वयं क्या हो, यह देखो!
Leave a Reply