जीवन की सार्थकता हेतु अनमोल ज्ञान-रत्न ग्रहण करना
मुझ पिता की शरण ग्रहण कर चुकी बच्ची ,दिन जिस प्रकार दिन ही कहलाता है,रात्रि रात्रि ही कहलाती है,फिर भी दिन और रात की अलग-2 अवस्थाएं होने से दिन की अपेक्षा रात्रि के कुछ पल अत्यंत कीमती कहे जाते हैं! हर पल,नक्षत्र एवं अवस्था का कुछ अंश अत्यंत फलदायक होता है! अगर उस पल को ही संभाल लिया जाता है तो पुरे दिन या रात्रि का फल मिल जाता है! जिस प्रकार पूरा जीवन कोई पुष्कर तीर्थ में स्नान कर लेता है और उसे सारे तीर्थो का पुन्य मिल जाता है ठीक उसी प्रकार पूरा दिन ध्यान न करने वाला जीव एक बार संध्या का समय ध्यान में व्यतीत कर देता है उसे पूरे दिन की प्रभु सेवा का फल मिल जाता है! बच्चे कभी-2 मन की गति इतनी तीव्र होती है की अत्यंत कठिनता से प्राप्त हो सकने वाली “बौद्धिक शक्ति ” स्वयं जागृत हो जाती है! इसके पीछे भी उदाहरण कुछ पलों के प्रयोग का ही आता है! सो बच्चे जीवन बहुत बड़ा होने के साथ -२ ,हर तरह के कर्म-बन्धनों से बंधे हुए तो हो ही तुम जीव,लेकिन फिर भी तुम कर्ता स्वयं को मत मानो! बुद्धि एवं मन का हिसाब मुझ परमात्मा के स्थायी स्थान अपनी आत्मा से बना कर रखो ! फिर जो होगा मुझ पिता के हिसाब से ठीक ही होगा,न्यारा होगा,प्यारा होगा! मात्र तुम निमित्त बनते रहो,बने रहे हो,बने रहोगे१ न जाने किस आत्मा का उधहार किस रीती से होना लिखा गया था! कर्म के फंदे तो मुझे सभी के कटवाने होते है,जब काम काटने का है फिर तेज़ धार वाले औजार की आवाश्यकता पड़ेगी! वह तेज़ धार तुम जीवो की बुद्धि ही होगी! जिसे पैनी करने का जरिए “ज्ञान-घाट ” होते हैं! तुम तो स्वयं ही घाट हो,कहीं जाने की आवाश्यकता तुम्हे नहीं! सो बच्चे कर्म के बलबूते तुम अपना हर तरह का कर्तव्य हर जीव के प्रति पूरा करते रहो! मन मुझ में लीन होगा तो कर्म मुझ तक पहुचेगा! तुम अछूती रहोगी कर्म-फल से! इस फल का हिसाब तो मुझे इकठा करना होता है! तुम निश्चिंत अपना कर्म करते रहकर क्षत्रिय वंश की भाँती विकारों का सफाया करने का मन बनाए रखो! बच्चे कर्म में कर जीव लीनहै! वह मुझ द्वारा ही चलाया जा रहा है! संस्कारों के हिसाब से उसका मन आत्मा के अधीन बनता है अन्यथा तो वह अपने ही विकारों के द्वारा दबोच लिया जाता है! जब घ्यान की वर्षा होती है तो विकार भाग जाते है और वहां से आत्मा का काम आरम्भ होता है! तो बच्चे इसी वर्षा की आवश्यकता कलियुग में पड़ती है तभी अनेको संगठन ,मठ,अलग-२ परंपराएं चालू की जाति है मन को आत्मा के अधीन करने के लिए! जिस जीव का मन जहाँ जिस वातावरण में शान्ति अनुभव करता है वही उसकी निष्ठा बनती है! उस समय असली कार्य आरम्भ होता है! भगवान् श्री कृषण की सोलह हज़ार रानियों का भी यही अर्थ है की १६ हज़ार आत्माएं विकारों की जेल में बंद थी! कहा जाता है की १६ हज़ार रानियों ने श्री कृषण कृपा से ही जेल से मुक्ति पायी थी अर्थात भगवान् ने ज्ञान-मुरली बजाई जिसे रानियों ने अपना कर जेल से छुटकारा पाया और सदा-२ के लिए भगवान् के गुण अपनाने का व्रत उन्होंने लेकर श्री-कृष्ण के हृदय में वास किया! ऐसे ही जीवो को चंगुल से छ्द्वाना होताहै विकारों के,यह व्रत लेकर चलना होगा,गुड दिखाओगे तो गुड खाने वाले तुम्हारे पास अवश्य आयेंगे!
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