भाव समर्पण और कृष्ण प्राप्ति की राह
Saturday, August 15th, 2009मुझ अगोचर पिता के बच्चे ,जिस प्रकार प्राण जो शरीर में रहते हैं,शरीर को चलाते हैं,हर पल रहते हुए महसूस होते हैं मगर उन्हें किसी ने देखा नहीं है,ठीक उसी प्रकार मैं अगोचर पिता तुम्हारे साथ हर पल रहकर तुम्हे चलायमान रखता हूँ लेकिन नेत्रों से दिखाई नहीं देता! इसका अर्थ यह नहीं की दिखाई नहीं दे रहा तो हूँ नहीं! हूँ,सदा हों,सदा रहूँगा! लेकिन क्या तुम मुझे देखना चाहते हो,यह तड़प कितनी है,इस बात का अंदाजा लगता हूँ मैं! बच्चे मीरा भी संसार में जन्म लेकर आई थी! तो उसका तड़प का फल क्या निकला की,जिस रूप को उसने चाहा उसी में सामना उसका बना! नाम जुड़ गया उसका उसी रूप के साथ! क्यूंकि उसी रंग में रंग गयी थी वह! ठीक उसी तरह पार्वती ने पर्वतो में रहकर जिस स्वरुप का ध्यान किया उस स्वरुप में स्वयं को डुबो दिया एवं शंकर को अर्धनारीश्वर नाम मिलने लगा! तो बच्चे हर संसारी प्राणी अगर चाहे तो परमात्मा की प्राप्ति उसे हो सकती है,लेकिन उसके लिए तो मन से व्यापार कौडियों का नहीं कीमती श्वासों का चलाना पड़ता है! एक-२ श्वास अनमोल हीरे की कीमत अदा कर्ता है! सो बच्चे आज यही ज्ञान-प्रेरणा तुम आत्मा को है की लग्न भी जब बच्चे की सच्ची होती है तो वहां अग्नि जो तड़प रुपी जलती है वही सच्ची जोत होती है! जहाँ जोत जलती है वहां परमात्मा का वास रहता ही है! जहाँ परमात्मा का वास होगा वहां आत्मा प्यासी रहे ऐसा होना असंभव होता है! तो बच्चे कीमती श्वासें जग को अर्पित न करते हुए मात्र मन से “टेर” ही निकालो
मैं तेरा हूँ,तू मेरा है,फिर भला क्यों रहता यहाँ अँधेरा है! चारो योगो की भटकी हुई मैं,अब तेरा घर ही मेरा है! दो कान दिए थे सुन ने को,पर कुछ भी सुन न पायी थी मैं,मन की इस वीणा से,टूटा फंदों का घेरा है! तेरा घर ही मेरा है! मीरा बनाने की चाहत ने,मुझे दर पे तेरे भेज दिया,जब रंग में लगी थी रंगने तेरे,राणा ने ज़हर उडेल दिया! इस विष से बच्चा लो मुझ को प्रभु,अब ज़हर पिया बहुतेरा है! बन पार्वती मैं वन में जाऊ,अब यही करो मुझ पर कृपा,अब तेरा घर ही मेरा है! बन शंकर तुम भी आ जाओ,मेरे मन की बुझा दो ये तृषा,तुम शंकर हो मैं भक्तन हूँ,दर्शन की कर दो अब कृपा! तेरा घर ही अब मेरा है! टूटा फंदों का घेरा है!
सुनो बच्चे कीमती श्वास ही तुम्हे मीरा बना देंगे और ये ही तुम्हे उस रंग में दुबोयेंगे जहाँ स्वयं श्री कृष्ण तुम्हारा हाथ थाम कर शंकर स्वरुप से तुम्हे पार्वती बना कर अपना लेंगे! भाग्यो को भाग मत होने दो! उन्हें कर्मो के द्वारा गुना करके बढाते रहो! यही संख्या तुम्हारी सीढीया बनेगी मुझ तक पहुचाने की !सबसे पहले शब्द की धुन को ग्रहण करो! रात्रि १२ बजे के बाद चलनी आरम्भ होती है सुबह होने से पहले तक चलती है! अर्थात कानो को खुला रखना होता है इस समय! अंतर्मन से उठने वाली इस धुन को देने वाल्व हैं ही श्री “कृष्ण” अर्थात जिसने इस धुन को सुन लिया कृष्ण की पकड़ उसे हो गयी! फिर उस छवि को अपने अन्दर निहारो जिसे प्राप्त करना चाहते हो! छवि का दर्धन होने से पहले वहां उजाला होगा फिर स्वरुप नज़र आएगा! स्वरुप का साक्ष्ताकार हो जाने के बाद स्वयं का स्थान प्रभु के हृदय में विचारते हुए हर कर्म जो भी तुम करोगे ऐसा हो नहीं सकेगा की प्रभु को प्री न हो! जब हर कर्म प्रभु के लिए प्रिय होगा तो जो होगा प्रभु के लिए! फिर तुम स्वयं को प्रभु में खोया हुआ अनुभव करोगे! एक-२ पल तुम्हे अनमोल खजाना जीवन का तभी महसूस होगा! सो बच्चे गुजर गए जमाने की तलाश छोड़ कर ,नया ज़माना नए सिरे से बनाना है जिसमें प्रभु,प्रभु के पारे ,प्रभु के प्रिय कर्म यही सब होगा! नाटक जो पहले तुम संसार के साथ करते रहे हो,अब मेरे साथ करने होंगे! फिर देखना तुम्हारा जीवन कैसा बनेगा! यही जीवन तुम्हारा अंतिम पल सुधारने वाला बनेगा! सो बच्चे निराहार रह कर पार्वती ने कठोर तप किया था तुम भी उसी की भागी बनो! यह वरदान है तुम्झे मुझ पिता का! आज से ही तुम्हारी सायमी जीवन की मनो-इच्छा पूरी हो सकेगी! कांटो भरा जीवन फूलो की सेज महसूस होगा!