इश्वर द्वारा आत्माओ का परीक्षण और उनके गुणों का सदुपयोग करवाना

मुझ अन्तर्यामी कहलाने वाले त्रिकालदर्शी अवधूत पिता शंकर के अनंत स्वरुप को प्राप्त कर चुके मेरे घर के सर्वश्रेष्ठ बच्चे सुनो ध्यान से किस बच्चे का जीवन किस तरीके से गुणवत्ता को प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है यह मुझ पिता को देखना होता है! बच्चे के भावो की गुणवत्ता की परख करके उत्तम मार्ग बच्चे को दिखा दिया जाता है! बच्चा मन की शुद्धता के अनुसार कर्म श्रृंख्ला से जुड़ कर अपने कर्मो का भुगतान करते रह्कत अपना जीवन मेरे प्रति समर्पित करता है! यह तो हुआ जीव का स्वयं का कल्याण होने का हिसाब! लेकिन इस से ऊपर एक गुप्त मार्ग चलता हैजिसमें प्रवेश  मात्र   उन्ही आत्माओ को मिलता है जिनका जीवन संकल्प बद्ध तरीके से चलना होता है! ये संकल्प अन्य आत्माओ के कल्याणार्थ लिए जाने होते हैं जिनमें पूर्वजन्मो के पाप दोषों के तहत भुगतान में लगी आत्माओ को उनके मार्ग तय करने में सहायता प्रदान करवाई जानी होती है! बच्चे राह चलते -२ प्यास से व्याकुल जीव को मात्र दो बोंड पानी मिल जाए उसी से वह जीव निढाल होकर गिरने से बच जाता है! जैसे ठीक उसी प्रकार इस धरा पर अपना जीवन जी रही आत्माएं कहीं न कहीं से ऐसे किसी मोड़ टकरा कर गिरी पड़ी है या घायल हो चुकी हैं जिस मोड़ पर उन्हें सिवाए  रोने के कुछ सूझ नहीं रहा क्यूंकि  यहाँ उन्हें देखने वाला या उठाने वाला सहारा देकर मलहम पट्टी करने वाला कोई नज़र नहीं आ रहा! बच्चे यह बात आध्यात्मिकता के हिसाब से कही जा रही है अर्थात अच्चा भला जीवन जी रही आत्मा पूर्वजन्मो के किसी अपराध के निर्धारित दंड  स्वरुप किसी भी कारण से गिरा दी जाति है यह उसका भगतान हुआ! लेकिन उसके स्वयं के पुन्य्कर्मो की पोंजी इतनी नहीं के किसी को उसका सहायक बनाकर उसे उठाने में मदद दिलवाई जा सके! तो ऐसे में मैं पिता अपने उत्तम बच्चो  की ऐसी श्रृंखला  तैयार  करवाता  हूँ  जो ऐसी आत्माओ के कल्याण के कार्य  में जुट  सकें ! बच्चे ऐसी उत्तम आत्माएं  अपने कर्मो की कसौटी  पर खरी  उतरे    इसके लिए उनकी भी पहले कड़ी  परीक्षा  ली जानी होती है! ऐसे आत्माओ को तराजू  के दो पल्दो  के बीच  खडा  कर दिया जाता है! एक पलडे  में सारे संसार  का धन -ऐश्वर्य  रखा  जाता है और दुसरे  में मैं पिता कष्टों  से तड़प  रही आत्माओ के लिए उस आत्मा  से उसका संकल्प जप -तप -व्रत  का लेने  के लिए उसका बाकी का जीवन भीख  के रूप में मांगने  के लिए अपना भिक्षा  पात्र  रख  देता हूँ! तो मेरा बच्चा किस चीज़ को उठाता  है ये देखना होता है मुझे१ बच्चे में कितना त्याग भाव है यह पता चलता है अगर बच्चे ने मेरे भिक्खशा -पात्र  में स्वयं का संकल्प से भरा मन दाल दिया तो बच्चे तुम मेरे द्वारा तैयार कसौटी पर खरे उतरे हो! यह मुझ पिता की स्वयं की इच्छा का हिसाब है जिसे तुम आत्मा ने सच्चे  मन से स्वीकार  है! बच्चे तुम्हारी  झोली  आज से उन हीरे -मोतियों  से भर  दी गयी है जिन्हें  मुझे जीवो  को उनके काम के बाद प्रदान करवाना  होता है! तुम्हारे कार्य की गति इस हिसाब से हो की देवताओं का आह्वाहन स्वयं होना बने! हर देवता अपनी कृपा का स्वरुप पेश करते रह कर तुम्हारे कार्य को प्रगति प्रदान करेंगे! कार्य का स्वरुप तुम्हारी गुणवत्ता जाहिर करेगा! दूध-घृत-दही-माखन-गंगाजल , इन पांच अमृतों का पंचामृत जैसे मुझे अत्यंत प्रिय है ठीक उसी प्रकार तुम्हारे पुण्यकर्म  पंचामृत बन कर मुझे स्वीकार्य होंगे! यह तुम आत्मा को मुझ पिता का वरदान  है!

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