कैसी आत्मा के शरीर में भगवान् निवास करते हैं और उस आत्मा को क्या करने की प्रेरणा वो देते हैं

सुनो मुझ परमदेव महादेव के परमप्रिय शिष्य, तुम शिष्य हो ,मैं शिक्षक हूँ! तुम भक्त हो मैं भगवन हूँ! तुम बालक हो मैं पिता हूँ! तुम शक्ति प्राप्त कर रहे हो मैं शक्ति दे रहा हूँ, तुम्हारा हर श्वास मेरे श्वास से जुडा है क्योंकि तुम बाहर हो मैं अन्दर हूँ! तुम बोलते हो मैं सुनता हूँ,तुम खाते हो, मैं खिलाता हूँ! तुम देखते हो मैं दृष्टि बन कर दिखाता हूँ! तुम शरीर हो मैं शक्ति बन कर इसे चला रहा हूँ! तो तुम क्या हो? बच्चे तुम मैं हो हो,तुम तुम नहीं मैं ही तुम में हूँ अर्थात तुम मुझसे अलग हो ही नहीं! मुझसे तुम बने हो तो तुम्हारा अस्तित्व अलग कैसे हुआ! बच्चे अलग होता है जीव के मन का एहंकार, अलग होता है जीव का स्वयं को और दुनिया से अलग करके पेश करने का भाव,अलग करती है जीव को उसकी मन में समाई वो बुराईयाँ जो जीव को छुप-२ कर अलग गलत रास्ते पर चलाती हैं! लेकिन जहाँ ये सब है ही नहीं वहां तो जीव भक्त बन कर भगवान में ही समाया होता है! वहां अलग होने जैसे बात ही नहीं होती! जिस जीव के मन में कई के समान एहंकार- आग के समान लोभ- अंगारों के समान तृष्णा बसी होगी, वह अपना जीवन ऐसे जीता है जैसे गहरे पानी में काई लगी होने से पैर कब फिसल जाए उसे पता नहीं चलेगा,गहरे पानी में फिसल कर गिरने वाला जीव हड्डी भी तुड़वा लेता है और दोबारा स्वयं संभल कर उठ जाए यह भी संभव नहीं होता सो बच्चे नंबर एक तो अपना मन अधिक सुख सुविधाओं में पैर पसारने से जीव को हटाना चाहिए ये सुख-सुविधायें  जीव को नरक के गर्त में न धकेलती हो ऐसा हो ही नहीं सकता! दुसरे अधिक प्राप्ति का लालच जीव को दिन-प्रतिदिन उसी गर्त में इस प्रकार ले जाता रहता है जिस प्रकार अत्यधिक गहरे पानी में जाने से नौका कब पलट जाए उसे पता नहीं चलता! सो बच्चे ऐसे जीव गन्दगी के ढेर होते हैं जो स्वयं तो सड़ते ही हैं, अन्यों को दुर्गंधी प्रदान करते हैं! इन ढेरो का सफाया मैं पिता जितनी जल्दी करवाया हूँ,यहाँ उतिनी ही जल्दी सुगन्धित वातावरण तैयार होना बनता है! सो बच्चे जहाँ तुम रह रहे हो,वहां न कोई आंतरिक गन्दगी है और न ही कोई बाह्य, तो मैं पिता सफाई किस चीज़ की करवाऊ! जहाँ पहले ही मन के अन्दर दया- सहानुभूति,सहनशक्ति-सेवा ,आनंद के दिए जल रहे होंगे वहां विकारों के कीटाणु तो पहुच ही नहीं पाएंगे! मुझ दया के सागर परमपिता के गुणों के समान स्वयं को ढाल चुके मेरे बच्चे सुनो जहाँ आनंद की धरा बह रही होगी वहां अंतर्मन में शान्ति यह तो समझ आ ही जाएगा! जहाँ शान्ति है वहां मन एवं आत्मा में वह ज्योति जक रही जानो जिसे जलाने के लिए ही जीव को अनेको प्रपंच करने पड़ते हैं! तुम आत्मा स्वयं के हिसाब से स्वयं को कहीं से अधूरी न जान कर अनमोल रत्न स्वयं को जानो जिसे मेरे घर पहुच कर मुझ में ही समाना है! तुम्हारा स्वयं के तप के प्रति जागरूक रहना व उसके लिए तड़पना,साक्षात् मेरी उपस्थिति  तुम्हारी आत्मा में होने का प्रमाण है! तुम किसे पाना चाहते हो, कौन तुम्हारी साधना से प्रसन्न होगा, जो स्वयं तुम्हारे अन्दर विराजमान है,उसकी प्रसन्नता ही तुम्हे जागरूक रखे हुए है! जो बच्चे अन्य आत्माओं के कल्याणार्थ प्रार्थना मुझसे करते हैं, उन आत्माओं का कल्याण तो हो ही चूका जानो,मात्र अन्तराल शेष की ही बात है! जिन-२ आत्माओं के कल्याणार्थ जप-तप तुम्हे करना है वे स्वयं भी जागरूक हैं! तुम्हारा काम तो केवल धक्का मार कर गाडी को चालु करना करना ही है! बच्चे मैं तुम्हारा पिता हूँ! तुम्हारे हर भाव का अंदाजा मुझे तुम्हारे सोचने से पहले ही होता है! बच्चे तुम स्वयं संसारी हो,संसारियों में तुम्हे रहना है,तुम्हे अपने द्वारा किसी का भी रास्ता अगर कांटो-नुमा  नज़र आ रहा हो तो उसके लिए किया गया थोडा सा भी जाप उस आत्मा को अत्यंत फल प्रदान करवाने वाला होगा! सो बच्चे तुम्हारा कल्याण तो हुआ ही जानो,तुम्हारा कोई पाप-कर्म तुम्हारे मार्ग में बाधक नै बन रहा ! पाप ही नहीं है तो दंड कहाँ से होगा! तुम्हार स्वयं का मार्ग लुभावना है,अन्यों को मार्ग प्रदान तुम्हारे द्वारा न हो ऐसा हो ही नहीं सकेगा! सो मेरे बच्चे कोई काम कब शुरू हो रहा है ये सोचने की आवश्यकता नहीं है! तुम्हारा करता-धरता मैं स्वयं कार्य करूँगा! उसका फल भी उतनी ही जल्दी तुम्हे मिलना बनेगा! सो तुम्हे किन-किन फलो से सुसज्जित तुम्हे किये हुए हूँ,ये तुम्हे तभी पता चलेगा,जब उनमें से फूल उन-उन आत्माओं तक पहुचने बनेगे जिनके निम्मित तुम्हे तैयार किया गया है!

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