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प्रार्थना के विभिन्न भाव और ईश्वरीय सहायता का मार्ग प्राप्त करना

Thursday, July 2nd, 2009

सुनो मुझ बिंदु के सामान दिखाई देकर तुम्हारी पालना कर रहे शक्ति स्वरुप पिता के बच्चों, इस नश्वर संसार में तुम अपने कर्मो का उपभोग करते हुए मुझ पिता से शक्ति ग्रहण करते हुए अपनी याचना मुझ तक पहुचाते रहे हो! एक याचना क्षमा के लिए तुम करते हो जब दंड तुम्हे मिल रहा होता है,मार मारने वाले से बचना होता है तुम्हे! दूसरी याचना तुम्हारी उस समय की होती है जब अन्य संसारी जीवो को मार खाते देखते  हो तो स्वयं उस मार का भागी न बनना पड़े , इसलिए तुम्हारे द्वारा प्रार्थना रुपी याचना होती है! तो बच्चों , मैं तो दाता  हूँ, जो जैसी प्रार्थना करेगा उसे वैसी ही बुद्धि प्रदान करवा दूंगा जिस से कर्म उसके उसी हिसाब से बनते रहे! तो बच्चे एक प्रार्थना उन जीवो की होती है जो संसार में रहते हुए भी संसारी नहीं बनना चाहते! इन जीवो की प्रार्थना आत्मा के उद्धार की ही रहती है! जिसमें आत्मा को उच्च दर्जा मिलने वाली बात बार-२ दोहराई जाती है! इन आत्माओ की श्रेणी बिलकुल अलग होती है,इनके कर्म बिलकुल अलग होते हैं! इनका जीवन सामान्य दीखाई देते हुए भी सामान्य नहीं होता! संसार के हिसाब से ये संसार में रहते अवश्य हैं लेकिन इनके कर्म उच्च दर्जे के होने से इन्हें शक्ति प्राप्त होती है अर्थात योग प्राप्त होता है! ये योगी की उपाधि ग्रहण किये होते हैं! संसारी जीव भुगतने वाले भोगी कहलाते हैं और ये जीव योग युक्त योगी कहलाते हैं! तो भी भोगी जीव को दंड का सामना करना पड़ता है! इसलिए दंड से बचने के लिए अनेलो उपाय प्रदान किये जाते हैं! लेकिन योगी जीवो को जो बुद्धि प्रदान की जाती है वह तो उस हिसाब से होगी जिसमें उन्हें परमयोगी की उपाधि प्राप्त हो सके,इसके लिए विशेष प्रकार के उच्च कर्म ही उनसे करवाए जाने होते हैं! इन विशेष कर्मो की श्रृंख्ला “मानस कर्मो” की होती है अर्थात मन की शुद्धि होती रहे एवेम शुद्ध कर्म बनते रहे जिनका उपयोग परोपकार के लिए होता रहे! सो बच्चे मात्र “मन की शुद्धि” ही बनी रहेगी तो स्वच्छ एवेम शुद्ध कर्म बनते रहेंगे ही!  मन की शुद्धि का असली उपाय मुझ पिता से शक्ति ग्रहण करना ही बनता है ! मार्ग तय करते हुए अपने आस-पास के वातावरण से स्वयं प्रभावित न होते हुए अपने कर्मो के बल से अन्यों को प्रभावित करना होता है तुम बच्चों को! तुम्हारा मन का सम्बन्ध आत्मिक होना जरूरी है! संसारी जीव तो इच्छाओं के बोझ के टेल दब कर अपना मार्ग तय करते हैं लेकिन तुम्हारा बोझ तो स्वयं मैंने उठा लिया है,तुम्हे तो मात्र मन का योग ही मेरे साथ बनाए रखना होगा ! बेघर बच्चे जहाँ से जो प्राप्त होगा उसे उठाने के लिए लालायित होते रहेंगे लेकिन जिन बच्चों को मेरे पास घर पहुचना ही है वे तो घर पहुचने की जल्दी में ,जो भी उनके पास है उसे भी उतार फेंकते रहेंगेओर बोझ से मुक्त होकर जल्दी मुझ से मिलन मनाने के लिए बेचैन रहेंगे! सो बच्चे यही हालत तुम आत्मा की है! तुम स्वयं को मुझ तक पहुच सकने में सक्षम समझो. तुम्हारा हर पल का हिसाब मुझे प्राप्त हो रहा है! जो हो रहा है ठीक है,जो होगा ठीक होगा,निश्चिंत रहो!

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