Archive for July, 2009

इश्वर द्वारा आत्माओ का परीक्षण और उनके गुणों का सदुपयोग करवाना

Sunday, July 26th, 2009

मुझ अन्तर्यामी कहलाने वाले त्रिकालदर्शी अवधूत पिता शंकर के अनंत स्वरुप को प्राप्त कर चुके मेरे घर के सर्वश्रेष्ठ बच्चे सुनो ध्यान से किस बच्चे का जीवन किस तरीके से गुणवत्ता को प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है यह मुझ पिता को देखना होता है! बच्चे के भावो की गुणवत्ता की परख करके उत्तम मार्ग बच्चे को दिखा दिया जाता है! बच्चा मन की शुद्धता के अनुसार कर्म श्रृंख्ला से जुड़ कर अपने कर्मो का भुगतान करते रह्कत अपना जीवन मेरे प्रति समर्पित करता है! यह तो हुआ जीव का स्वयं का कल्याण होने का हिसाब! लेकिन इस से ऊपर एक गुप्त मार्ग चलता हैजिसमें प्रवेश  मात्र   उन्ही आत्माओ को मिलता है जिनका जीवन संकल्प बद्ध तरीके से चलना होता है! ये संकल्प अन्य आत्माओ के कल्याणार्थ लिए जाने होते हैं जिनमें पूर्वजन्मो के पाप दोषों के तहत भुगतान में लगी आत्माओ को उनके मार्ग तय करने में सहायता प्रदान करवाई जानी होती है! बच्चे राह चलते -२ प्यास से व्याकुल जीव को मात्र दो बोंड पानी मिल जाए उसी से वह जीव निढाल होकर गिरने से बच जाता है! जैसे ठीक उसी प्रकार इस धरा पर अपना जीवन जी रही आत्माएं कहीं न कहीं से ऐसे किसी मोड़ टकरा कर गिरी पड़ी है या घायल हो चुकी हैं जिस मोड़ पर उन्हें सिवाए  रोने के कुछ सूझ नहीं रहा क्यूंकि  यहाँ उन्हें देखने वाला या उठाने वाला सहारा देकर मलहम पट्टी करने वाला कोई नज़र नहीं आ रहा! बच्चे यह बात आध्यात्मिकता के हिसाब से कही जा रही है अर्थात अच्चा भला जीवन जी रही आत्मा पूर्वजन्मो के किसी अपराध के निर्धारित दंड  स्वरुप किसी भी कारण से गिरा दी जाति है यह उसका भगतान हुआ! लेकिन उसके स्वयं के पुन्य्कर्मो की पोंजी इतनी नहीं के किसी को उसका सहायक बनाकर उसे उठाने में मदद दिलवाई जा सके! तो ऐसे में मैं पिता अपने उत्तम बच्चो  की ऐसी श्रृंखला  तैयार  करवाता  हूँ  जो ऐसी आत्माओ के कल्याण के कार्य  में जुट  सकें ! बच्चे ऐसी उत्तम आत्माएं  अपने कर्मो की कसौटी  पर खरी  उतरे    इसके लिए उनकी भी पहले कड़ी  परीक्षा  ली जानी होती है! ऐसे आत्माओ को तराजू  के दो पल्दो  के बीच  खडा  कर दिया जाता है! एक पलडे  में सारे संसार  का धन -ऐश्वर्य  रखा  जाता है और दुसरे  में मैं पिता कष्टों  से तड़प  रही आत्माओ के लिए उस आत्मा  से उसका संकल्प जप -तप -व्रत  का लेने  के लिए उसका बाकी का जीवन भीख  के रूप में मांगने  के लिए अपना भिक्षा  पात्र  रख  देता हूँ! तो मेरा बच्चा किस चीज़ को उठाता  है ये देखना होता है मुझे१ बच्चे में कितना त्याग भाव है यह पता चलता है अगर बच्चे ने मेरे भिक्खशा -पात्र  में स्वयं का संकल्प से भरा मन दाल दिया तो बच्चे तुम मेरे द्वारा तैयार कसौटी पर खरे उतरे हो! यह मुझ पिता की स्वयं की इच्छा का हिसाब है जिसे तुम आत्मा ने सच्चे  मन से स्वीकार  है! बच्चे तुम्हारी  झोली  आज से उन हीरे -मोतियों  से भर  दी गयी है जिन्हें  मुझे जीवो  को उनके काम के बाद प्रदान करवाना  होता है! तुम्हारे कार्य की गति इस हिसाब से हो की देवताओं का आह्वाहन स्वयं होना बने! हर देवता अपनी कृपा का स्वरुप पेश करते रह कर तुम्हारे कार्य को प्रगति प्रदान करेंगे! कार्य का स्वरुप तुम्हारी गुणवत्ता जाहिर करेगा! दूध-घृत-दही-माखन-गंगाजल , इन पांच अमृतों का पंचामृत जैसे मुझे अत्यंत प्रिय है ठीक उसी प्रकार तुम्हारे पुण्यकर्म  पंचामृत बन कर मुझे स्वीकार्य होंगे! यह तुम आत्मा को मुझ पिता का वरदान  है!

कैसी आत्मा के शरीर में भगवान् निवास करते हैं और उस आत्मा को क्या करने की प्रेरणा वो देते हैं

Thursday, July 9th, 2009

सुनो मुझ परमदेव महादेव के परमप्रिय शिष्य, तुम शिष्य हो ,मैं शिक्षक हूँ! तुम भक्त हो मैं भगवन हूँ! तुम बालक हो मैं पिता हूँ! तुम शक्ति प्राप्त कर रहे हो मैं शक्ति दे रहा हूँ, तुम्हारा हर श्वास मेरे श्वास से जुडा है क्योंकि तुम बाहर हो मैं अन्दर हूँ! तुम बोलते हो मैं सुनता हूँ,तुम खाते हो, मैं खिलाता हूँ! तुम देखते हो मैं दृष्टि बन कर दिखाता हूँ! तुम शरीर हो मैं शक्ति बन कर इसे चला रहा हूँ! तो तुम क्या हो? बच्चे तुम मैं हो हो,तुम तुम नहीं मैं ही तुम में हूँ अर्थात तुम मुझसे अलग हो ही नहीं! मुझसे तुम बने हो तो तुम्हारा अस्तित्व अलग कैसे हुआ! बच्चे अलग होता है जीव के मन का एहंकार, अलग होता है जीव का स्वयं को और दुनिया से अलग करके पेश करने का भाव,अलग करती है जीव को उसकी मन में समाई वो बुराईयाँ जो जीव को छुप-२ कर अलग गलत रास्ते पर चलाती हैं! लेकिन जहाँ ये सब है ही नहीं वहां तो जीव भक्त बन कर भगवान में ही समाया होता है! वहां अलग होने जैसे बात ही नहीं होती! जिस जीव के मन में कई के समान एहंकार- आग के समान लोभ- अंगारों के समान तृष्णा बसी होगी, वह अपना जीवन ऐसे जीता है जैसे गहरे पानी में काई लगी होने से पैर कब फिसल जाए उसे पता नहीं चलेगा,गहरे पानी में फिसल कर गिरने वाला जीव हड्डी भी तुड़वा लेता है और दोबारा स्वयं संभल कर उठ जाए यह भी संभव नहीं होता सो बच्चे नंबर एक तो अपना मन अधिक सुख सुविधाओं में पैर पसारने से जीव को हटाना चाहिए ये सुख-सुविधायें  जीव को नरक के गर्त में न धकेलती हो ऐसा हो ही नहीं सकता! दुसरे अधिक प्राप्ति का लालच जीव को दिन-प्रतिदिन उसी गर्त में इस प्रकार ले जाता रहता है जिस प्रकार अत्यधिक गहरे पानी में जाने से नौका कब पलट जाए उसे पता नहीं चलता! सो बच्चे ऐसे जीव गन्दगी के ढेर होते हैं जो स्वयं तो सड़ते ही हैं, अन्यों को दुर्गंधी प्रदान करते हैं! इन ढेरो का सफाया मैं पिता जितनी जल्दी करवाया हूँ,यहाँ उतिनी ही जल्दी सुगन्धित वातावरण तैयार होना बनता है! सो बच्चे जहाँ तुम रह रहे हो,वहां न कोई आंतरिक गन्दगी है और न ही कोई बाह्य, तो मैं पिता सफाई किस चीज़ की करवाऊ! जहाँ पहले ही मन के अन्दर दया- सहानुभूति,सहनशक्ति-सेवा ,आनंद के दिए जल रहे होंगे वहां विकारों के कीटाणु तो पहुच ही नहीं पाएंगे! मुझ दया के सागर परमपिता के गुणों के समान स्वयं को ढाल चुके मेरे बच्चे सुनो जहाँ आनंद की धरा बह रही होगी वहां अंतर्मन में शान्ति यह तो समझ आ ही जाएगा! जहाँ शान्ति है वहां मन एवं आत्मा में वह ज्योति जक रही जानो जिसे जलाने के लिए ही जीव को अनेको प्रपंच करने पड़ते हैं! तुम आत्मा स्वयं के हिसाब से स्वयं को कहीं से अधूरी न जान कर अनमोल रत्न स्वयं को जानो जिसे मेरे घर पहुच कर मुझ में ही समाना है! तुम्हारा स्वयं के तप के प्रति जागरूक रहना व उसके लिए तड़पना,साक्षात् मेरी उपस्थिति  तुम्हारी आत्मा में होने का प्रमाण है! तुम किसे पाना चाहते हो, कौन तुम्हारी साधना से प्रसन्न होगा, जो स्वयं तुम्हारे अन्दर विराजमान है,उसकी प्रसन्नता ही तुम्हे जागरूक रखे हुए है! जो बच्चे अन्य आत्माओं के कल्याणार्थ प्रार्थना मुझसे करते हैं, उन आत्माओं का कल्याण तो हो ही चूका जानो,मात्र अन्तराल शेष की ही बात है! जिन-२ आत्माओं के कल्याणार्थ जप-तप तुम्हे करना है वे स्वयं भी जागरूक हैं! तुम्हारा काम तो केवल धक्का मार कर गाडी को चालु करना करना ही है! बच्चे मैं तुम्हारा पिता हूँ! तुम्हारे हर भाव का अंदाजा मुझे तुम्हारे सोचने से पहले ही होता है! बच्चे तुम स्वयं संसारी हो,संसारियों में तुम्हे रहना है,तुम्हे अपने द्वारा किसी का भी रास्ता अगर कांटो-नुमा  नज़र आ रहा हो तो उसके लिए किया गया थोडा सा भी जाप उस आत्मा को अत्यंत फल प्रदान करवाने वाला होगा! सो बच्चे तुम्हारा कल्याण तो हुआ ही जानो,तुम्हारा कोई पाप-कर्म तुम्हारे मार्ग में बाधक नै बन रहा ! पाप ही नहीं है तो दंड कहाँ से होगा! तुम्हार स्वयं का मार्ग लुभावना है,अन्यों को मार्ग प्रदान तुम्हारे द्वारा न हो ऐसा हो ही नहीं सकेगा! सो मेरे बच्चे कोई काम कब शुरू हो रहा है ये सोचने की आवश्यकता नहीं है! तुम्हारा करता-धरता मैं स्वयं कार्य करूँगा! उसका फल भी उतनी ही जल्दी तुम्हे मिलना बनेगा! सो तुम्हे किन-किन फलो से सुसज्जित तुम्हे किये हुए हूँ,ये तुम्हे तभी पता चलेगा,जब उनमें से फूल उन-उन आत्माओं तक पहुचने बनेगे जिनके निम्मित तुम्हे तैयार किया गया है!

© 1995- Gyanvaani.com
click for hit counters gallery
hit counters