दृद -संकल्प, तप और इश्वर प्राप्ति
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मुझ परमज्योति एवं बिन्दु स्वरुप शिव का अपने बच्चों को आशीर्वाद!अग्नि जिस प्रकार अपना सेक अधिक फैलाकर अन्य वस्तुओं को भी गर्म करके अपने वहां होने का एहसास दिलाती है ठीक उसी प्रकार तुम आत्मा की मुझ पिता से लग्न अपना एहसास अन्य आत्माओं को इस ज्ञानवाणी के ज्ञान से करवाते रह कर मेरी उपस्थिति का एहसास करवाती है ! बच्चे सेक में जैसे हर कोई एक सा आनंद अनुभव नहीं करता ,उसी प्रकार ज्ञान प्राप्ति की इच्छा या उस से आनंद सभी को एक सा प्राप्त हो यह नहीं हो सकता ! सो बच्चे मुझ पिता की कृपा वैसे तो सब जीवो को प्राप्त हो रही है लेकिन उस कृपा को कई गुना बढ़ा कर कौन उसे प्रयोग करता है यह जीव की मेहनत एवं आस्था के ऊपर निर्भर करता है! बच्चे! आस्था भी बहुत से जीवो की बहुत होती है लेकिन मेहनत अपनाना हर जीव के द्वारा बन सके ऐसा होना असंभव होता है! सो मेहनती बच्चो को अलग चुन लिया जाता है! उनसे मेहनत करवाते रहकर उनकी आस्था और मेहनत बढती रहे,इसके लिए प्रयास जारी रहता है !इस प्रयास में बच्चों को उसके मार्ग पर चलते-२ कुछ देर के बाद धक्का देकर देखा जाता है की उसके पाव कितने मजबूत हैं! माना अचानक धक्के से उसके पाव डगमगा गये भी तब भी वह दोबारा वापिस ख़ुद को उसी स्थान पर लाने में प्रयास किस हिसाब से करता है! स्वयं की मेहनत उसके द्वारा कितनी बढती है! इस प्रयास में वह कितना तड़पता है मुझ पिता से मिलने के लिए ! सो बच्चे स्वयं को उसी हिसाब से गिरी पड़ी जानो! मुझ पिता को दोबारा पाने के लिए तुम स्वयं को कितना प्रयास करवाती हो यही अब मुझ पिता द्वारा देखा जाना है ! बच्चे यहाँ मानसिक चोट भी लगी ,गिराया भी गया और दुःख भी सहना पड़ा ! फिर ऊपर उठने के लिए उस चोट का दर्द सहन करके भी ,स्वयं को चलाना पड़ता है बिना किसी के सहारे के ! सो बच्चे, अपनी मानसिक स्थिति को वही चोट के दर्द का एहसास समझो !तुम्हारा दृद्द-संकल्प ही तुम्हारा साथी है ! उसका सहारा तुम्हे शक्ति प्रदान करेगा ऊपर चढ़ने के लिए ! इसके बिना तो स्वयं को गिरी हुई ही जानो! सो बच्चे, आज का तुम्हारा भाव मुझ पिता के प्रति अपनी तड़प का , तुम्हे यही प्रेरणा दिलवाता है कि आज,अभी इसी वक़्त तुम्हारा दृद संकल्प तुम्हारा भाव बनना चाहिए! मुझ पिता की शरण तो तुम्हारे भावो को आधार बनाने से ही प्राप्त होगी ! सो बच्चे, कठोर तप का श्रेय तुम्हारी आत्मा को मिले ,इसके लिए तप का व्रत धारण करो!तुम्हारा प्रत्येक दिन ,प्रत्येक घडी ,प्रत्येक पल व्रत संलिप्त होना आवश्यक है ! मुझ पिता की प्रत्येक वस्तु की अधिकारिणी तुम स्वयं बन जोगी ! मुझ पिता के लिए छोडा गया अन्न का एक दाना कई करोड़ गुना फलदायक होता है ! अपनी निष्ठां इसी में समझो कि पिता की शरण में जाने से पहले अपना सब भार पिता के प्रति समर्पित करना है ! भार से हलके होकर ऐसे तप होगा के बस वायु में उड़ने लायक बन सकोगे ! सो बच्चे जलचर से थलचर और नभचर तुम्हे बनाना है ! जलचर को कोई भी निचे ही डुबो सकता है और थलचर को बाँध कर रख सकता है पर नभचर बनना तुम्हे मुक्त बना देगा ! बस यही प्रयास करना है !
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Tags: ज्ञानवाणी
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