ज्ञानवाणी -1(1996)
Tuesday, October 7th, 2008२४ जनवरी दिन रविवार रात्री की वेला में शिव पिता संग मिलन मनाकर ज्ञान मणियाँ प्राप्त करते हुए पिता से जीवन की उन्नति हेतु प्रार्थना करके उसमें बाधक एवं आत्मा के हास में कारण बन रही आत्माओ के मन के दोषों के निवारण हेतु प्रार्थना करके आत्मा को बल दिलवाने के लिए उच्चतम मार्ग जप-तप-व्रत-संध्यावंदन -योग-ध्यान इनका सहारा मुझे मिले इसके लिए प्रार्थना की !
मुझ दया के सागर पिता शिव के अनमोल बच्चे ! कभी कभी कुकर्मियों को दंड दिलवाने के लिए उन आत्माओ का सहारा लेना होता है, जो उत्तम मार्ग पर चल रही होती हैं, उन्हें सहसा रोक देना पड़ता है और भिड्वा दिया जाता है उन आत्माओ के साथ जिनसे उनका कोई लेना देना नहीं होता, मात्र उन्हें दंड की परिधि पर ला कर खड़ा करना होता है,इसलिए दंड योग्य कुकर्मो में उन्हें लगवा कर उताम आत्मा का हास उनके द्वारा करवाना होता है,जिस आत्मा का हास हो रहा है उसका कही कोई मन का सम्बन्ध उस आत्मा के साथ न होते हुए भी उसे पिटना पड़ता है, यहाँ यह काम उस उत्तम आत्मा को मेरे लिए करना होता है! इसलिए उसे काम में लगा हुआ देख कर मैं तो बहुत खुश हुआ करता हु, लेकिन वह उतम आत्मा स्वयं को मार्ग से हटा हुआ देख कर एवं बेवजह पिटने से दुखी हर पल हुआ करती है! इस समय आत्मिक हास वह पल पल महसूस करके तडपती है और मुझ पिता के आगे गिड़गिडाती है और उसका यह गिड़ गिडाना ही उसकी प्रार्थना बन जाती है मुझ पिता के आगे ! सो बच्चे ,काम मुझ पिता का जब पूरा होना होता है तो उत्तम बच्चे को पुरुषार्थ कार्य मरीं फ़िर से लगा दिया जाता है, सो बच्चे यही हाल तुम स्वयं का हुआ जानो! चाह कर भी जो तुम्हे अभी उन्नत मार्ग प्राप्त नहीं हो रहा उसके पीछे मुझ पिता के काम का अधूरापन जानो , काम पूरा होते ही तुम्झे अत्यन्त उत्तम एवं उज्जवल परिधि प्रदान करवा दी जाएगी! तब तक निश्चिंत भाव से जहाँ बिठाए जा रहे हो, बैठे रहो! तुम्हे कुछ हानि नहीं होनी बन रही,उत्तमता के घेरे से निकले अवश्य हो लेकिन न्यूनता की और तो नहीं जा रहे ,तो बेचैन क्यो हुए! चैन तो तुम्हारी इस बात में छिपी हुई है के काम तुम मेरे आ रहे हो, जिस जीव को मैं अपने काम में प्रयुक्त करता हु क्या वह सामान्य होगा, नहीं! वह तोह अत्यन्त उच्चतम श्रेणी का होगा, सो बच्चे तुम स्वयं को उच्चतम जानो ! तुम्हारा हर भाव, हर कर्म मेरा है! तुम्हे उच्चतम अवस्था प्रदान करवानी थी, इसीलिए पहले काम में प्रयुक्त कर लिया गया! बाकी रही बात आत्मिक हास करने में संलग्न आत्मा की, बच्चे इस समय परीक्षा तुम्हारी नहीं बल्कि उस आत्मा की चल रही है, जिसे वक्त रहते ही सुधरना उसके खाते में लिख दिया गया है, उसके सारे खातो को खोल कर कुकर्मो को अलग करना जारी है इस समय! सो पोटली कुकर्मो को खुलेगी तो दुर्गन्ध से मन को परेशानी तो होगी ही! सो उसी का हिसाब तुम स्वयं पर पडा असर जानो! तुम्हे किसी बात की चिंता की आवश्यकता नहीं है! यह तो वही खेत है जिसमें जैसी बुआई जिसने की होगी,उसके सामने रख दी जाएगी,कांटे बोए होंगे तो स्वयं चुन ने पड़ेंगे! फूल बोए होंगे तो फूलो का गुलदस्ता तुम्हारे सामने रख दिया जाएगा! तो बच्चे कांटे चुनने वाला कांटो की चुभन से बचा रह सकेगा, नहीं न! उसकी स्वयं की कमाई का हिसाब उसे सहना पड़ रहा है!तोह बच्चे कुकर्मो की गाँठ को कब तक छुपाये रखती वह आत्मा अन्यो की नजर से !
तो उसे कुकर्मो के बोझ से मुक्त करवाने का भाव मुझ पिता का आज उसे इस कदर बाहर खींच लाया है मन के उस दुर्गंधी भरे वातावरण से जहाँ उसके भाव सदा नीचता से ग्रस्त हो जाया करते हैं की अब साया भी किसी विषैली भावना का उसे छूने न पायेगा ! रंगबिरंगी रोशनियों के चमकारे में थिरकने वाला उसका मन स्वयं के ही अंतःकरण में गोते लगायेगा ! अंतःकरण शुद्ध है तो उसका प्रभाव अवश्य ही शुद्ध होगा ! सो बच्चे “रामरक्षा स्तोत्र ‘ का जाप नित्य प्रति करने से उस आत्मा को स्वयं का मार्ग शुद्ध होता नज़र आयेगा ! बाकी तुम्हारी प्रार्थना स्वयं के उन्नत मार्ग पर चलने की , तो बच्चे तुम्हे अत्यन्त सुंदर संवाद “शिव -पार्वती ” को पढ़ते रहकर अपना मार्ग खुला जानना होगा ! तुम्हे उच्चतम स्तोत्र “रामरक्षा का पाठ करते रह कर अपना तथा कल्याण के लिए प्रयुक्त आत्मा का कल्याण करना होगा ! टाप -जप -पूजा -पाठ सब इसी में सम्माहित हुए जानो ! मुझ पिता के सच्चे बच्चे तुम्हारा कल्याण हुआ जानो ,तुम्हे वैभव के अम्बार अपने घर में लगते नज़र आयेंगे !उच्चतम आत्मा का सानिध्य तुम्हे प्राप्त होगा !अनिष्टकारी ,कुकर्मी ,अधर्मी ,अश्लील आत्माओ का प्रभाव तुम पर नहीं पड़ेगा !उत्तम मार्ग मिलने से जीवन उन्नति की और बढ़ते रहकर पवित्रता जीवन की तुम्हे मिलने से एक नया छोर जीवन का प्रारंभ होगा !बच्चे हर काम की पूर्णता का एक समय निश्चित होता है ! इस काम को भी समयानुसार पूरा हुआ जानना ! सो बच्चे जीवन को निश्चिन्तता से खुल कर जीयो ! तुम्हारा कोई हास नहीं हुआ ! मात्र मन की दुविधा है !उसकी कुण्डी खुलवा दी जानी है !तुम्हे पर्मोप्चार करना है इसलिए रामायण पाठ करते रहकर जहाँ तक हो सके हर एक आत्मा के निमित एक पाठ करो !भगवन शंकर की आराधना से हर क्लेश ,कष्ट स्वयं दूर हो जाया करते हैं तो इसके लिए सुबह -सुबह नित्य प्रति महामृत्युंजय का जाप अवश्य करना होगा ! बच्चे नित्य प्रति जाप चलने से घर का कलह भी अवश्य ही समाप्त होगा ! तुम मेरे बच्चे हो ,तुम्हे हर पग पर सलाह देना मेरा काम है ! तुम निश्चिंत भाव से जाप करते रह कर अपना मन टिकाये रखो ! तुम्हे दिन दुगनी -रात चौगुनि उन्नति प्राप्त होगी !तुम्हे हर पल शान्ति दिलवानी है इसके लिए वातावरण तैयार होना बन रहा है !