Archive for October, 2008

ज्ञानवाणी-3(1996)

Tuesday, October 14th, 2008

९ मई १९९६ दिन गुरूवार दोपहर के अन्तिम प्रहर में अपने परम पिता शिव परमात्मा संग मिलन मनाकर अत्यन्त आनंद की अनुभूति करते हुए जीवन के शेष लम्हों का प्रयोग जीवन को सार्थक बनाने में लाभकारी सिद्ध हो ,इसके लिए अत्यन्त उपयोगी,लाभकारी,अत्यन्त सहायक शुद्ध वातावरण,एवं सहयोगी परिस्थितियाँ प्राप्त हो यही प्रार्थना मुझ आत्मा की परमात्मा से है!

सुनो मेरी बच्ची, कलियाँ फूलो की पहले खिलती हैं,वे ही फूल बनती हैं,उन्हें अलग से किसी विशेष हवा या पानी की आवश्यकता पड़े ऐसा नहीं होता! कली बन गयी है डाली पर तो फूल तो आएगा ही, ऐसा विश्वास माली को हो जाता है! माली का काम तो डाली की रक्षा करने का होता है! अधिक तेज़ वर्षा, आंधी ,रोग -कारक कीटाणु कली को नष्ट कर सकते हैं, इन्ही को ध्यान में रखते हुए कब,कैसे कली को बचाया जा सकता है,यह चिंता माली हर समय करता है! सो बच्चे संसार में रहते हुए किस-किस बात का भय तुम्हे हो सकता है,उसे दूर करने की चिंता भी मुझ पिता को है! उसका सामान अलग से तैयार कर दिया गया है! तुम्हारी हर तड़प ,परिस्थियों को संभालने के लिए मुझ पिता से प्रार्थना करने का ये भाव ही तुम्हे उस वातावरण को दिलवा देंगे जिसमें मुझ पिता की अनुकम्पा , पवित्रता की योग एवं द्यानावास्था तुम्हे प्राप्त होगी! सो बच्चे मिटटी और पानी तो पौधे के लिए वही रहता है, मात्र निगरानी माली की बढ़ जाती है!सो उस हिसाब से तुम्हे अधिक संभालना मेरा काम है!अब आती है बारी जीवन की परिस्थितियों को बदलने की!बच्चे अधिक आंधी आएगी जीवन में तो तुम ग्रस्त होगी ! उस आंधी से जो असर तुम पर होगा ,उसका बुरा प्रभाव आत्मा पर मन के जरिये होगा ! लेकिन उसी आंधी के ना आने का इंतजाम हो तो मुझे करना है , वह ही कर दिया है समझो ! दिन -दुगनी रात चौगुनी उन्नति तुम्हारी होगी अपने क्षेत्र में ! नित्य नए परिधान पहन कर वातावरण तुम्हारे सम्मुख पेश होगा ! मेरे बाग़ की सुन्दर कली तुम आत्मा बहुत जल्दी सुन्दर फूल बन कर तैयार हो जोगी ! तुम्हे तो बस खिलना है यही तुम्हारा काम है , बाकी के काम तो मुझ बाग़ के मालिक के हैं जो माली बन कर तुम्हे संभाले हुए है ! मेरे बाग़ के फूल अत्यंत सुन्दर हो यही मेरी इच्छा है ! बाकी रही तुम जीवात्मा के भावो की बात कि समय पर जप -तप -भजन -पूजा -ध्यान कुछ नहीं होता ! बच्चे यहाँ किसी बिगडैल बच्चे को सुधारने का काम तो हो नहीं रहा , यहाँ तो स्वयं का सुधार करने कि चिंता कर रहे बच्चे का हिसाब है ! तो बच्चे तुम निश्चिंत भाव से जो हो रहा है , जैसा हो रहा है उसी में मगन रहो ! स्थिति स्वयं बनती रहेगी ! लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए अपने हर लम्हे को एक कीमती तोहफा मुझ पिता की और से मिलता समझो ! तोहफे की कदर तो एक साधारण सामान से ज्यादा होती है ! उसी हिसाब से अपने प्रिय तोहफे को सदुपयोग करना है उसकी कदर करते रहो !तुम्हारा आने वाला समय इन्ही तोहफों के कारण स्वर्णिम बन जाएगा ! किसी धनवान की गरिमा उसे अन्दर से गन्दा कर देती है लेकिन जिसके पास मुझ पिता के तोहफे रुपी धन का अम्बार लग जाता है ,वह तो राजा बन जाता है ! सो बच्चे राजा की भाँती स्वयं को तक्दीरवान समझो की हर पल धन की वर्षा तुम्हारे ऊपर हो रही है ! धन भी वह जिसका हर कोई हकदार भी नहीं हो सकता ! सो बच्चे पूर्वजनम के राजा को इस जनम में भी राजा बनाना था ,इसीलिए राह बना दी गयी ! अब खजाने को बढ़ाना और उस से अन्यों का पालन करना तुम्हारा कर्तव्य होना चाहिए ! बच्चे करम की परिभाषा को ध्यान में रखते हुए उसका स्वरुप अति दर्शनीय बनाओ ,ये करम तुम्हारी भावनाओ के प्रतीक होंगे ,इन्ही का फल तुम्हे इनाम के तौर पर दिया जायेगा ! सौ शुभ कर्मों का फल एक गौ दान के बराबर होता है ! तो तुमने कितनी गौ दान करनी हैं यह सोच कर समय को संभालो !सौ गौ दान करने से एक अश्वमेघ यज्य का फल मिलता है ! एक अश्वमेघ यज्य में पूर्व जन्मों तथा इस जनम के लिए बुरे करम – दोषों का फल स्वयं स्वाहा हो जाता है ! जब कोई पाप फल शेष नहीं रहेगा ,फिर कोई परिस्थिति गलत कैसे हो सकती है ! सो बच्चे स्वयं को दंड से बचाने वाले तुम ही होते हो ! मुझे अपना हर बच्चा उतना ही प्रिय होता है जितना प्रिय बच्चे को अपने शरीर का हर अंग होता है ! तो तुम्हारी सुरक्षा तुम्हारे से करवा कर मैं खुश होता हूँ ! तो सुनो मेरी प्रिय बच्ची , जिस प्रकार एक पिता पूरे परिवार की पालना करता है ,फिर पल करके बच्चे बड़े होकर अपने -अपने बच्चों की पालना करें , ठीक उसी प्रकार मुझ pita की चिंता का विषय बनता है कि कब बच्चा तैयार हो और अन्य बच्चों की पालना करे , जिस से और बच्चों की पालना का काम आगे चलता रहे ! सो इसके लिए अनेकों आत्माएं अलग -अलग तरीके से काम में लगा दी गयी हैं ! तुम आत्मा भी अपने करम को बढावा देने के लिए दिन -रात मुझ पिता से प्रार्थना करती हो ! लेकिन बच्चे जो रोग कई -2 जन्मों के दोषों के फल स्वरुप जीव भुगत कर दुखी हो रहे होंगे ,उनके निवारणार्थ तुम्हे नियुक्त किया जा चूका है ! यह काम बाह्य एवं आंतरिक , दो विधियों से चल रहा है ! अत्यंत गुप्त रूप से चलने वाले इस काम को निष्काम भाव से करने का संकल्प तुम आत्मा करके अपना जीवन सुखद बनाओ ! दो -चार घडियां जीवन की शेष रह गयी हैं ,इन्हें मजबूत करके अपने पल -पल का हिसाब बढाते रहो ! वातावरण अत्यंत सुखद तुम्हे प्राप्त होगा मुझ पिता का वादा है ! राजवैद की भाँती पालकी की सवारी करते रह कर हर आत्मा को दुःख -निवारण औषधि वितरित करते रहो !

ज्ञानवाणी-2

Tuesday, October 7th, 2008

२५ जनवरी दिन सोमवार दोपहर की वेला में पिता शिव से जीवन में चल रहे दंड भुगतने के समान वातावरण को सामान्य बनाने के लिए प्रार्थना करके आत्मिक गुणों की वृद्धि के लिए प्रार्थना की!
मुझ दीनदयालु दया के सागर कृपालु पिता की निःसंदेह उत्तमता को प्राप्त हो चुकी संतान जब कोई नई अवस्था किसी जीव को दिलवानी होती है तो परिस्थितियाँ एक दम अपना स्वरुप बदल लेती हैं,पहले जो जैसा था वह वैसा न रहकर बदला बदला सा लगने लगता है या जो पहले था वैसा रहता ही नहीं! जिस प्रकार एक पेड़ जो तानकर खडा होता है,जरा सी चिंगारी उसे राख के ढेर में बदल देती है,उस राख के ढेर को देख कर कोई नहीं कहेगा की यह एक पेड़ खड़ा है! वह तो राख बन गया,राख तो राख होती है,वह किसी भी चीज़ की हो सकती है! फिर वह बड़ा सा पेड़ जला हो या कोई शरीर! तो बच्चे इसी प्रकार जब कहीं अहंकार जलता है तो उस से जो भाव बचेंगे उस से जीव का हाल उसी विभूति के समान बनता है जो भगवान् शंकर का दिखायी देता है! अर्थात अहंकार जीव के अन्दर जलता है लेकिन जब अहंकार स्वयं जल कर राख हो जाता है तो जीव की अवस्था बदल जाती है ! जैसे राख ठंडी होकर पड़ी रहती है उसी प्रकार जीव अहंकार से शून्य हो जाता है! सो बच्चे तुम्हारा हिसाब दंड भुगतने का उसी हिसाब से है जिस प्रकार आग जला कर पेड़ को जलाया जाता है तो धरती का आश्रय लेना पड़ता है, तो तपना धरती को पड़ता है! जहाँ धरती तो मात्र आश्रय देने के लारण कष्ट भोगती है , काम तो पेड़ का हो रहा होता है, ठीक उसी प्रकार किसी जीवात्मा के अन्दर के अहंकार की समाप्ति के अवसर पर किसी न किसी आत्मा को समर्पण करना पड़ता है! सो बच्चे जब उचित वेला आती है तब कलि खिलकर अपनी महक वातावरण में बिखेर देती है! ठीक इसी प्रकार जब मुझे तुम्हारा स्वरुप जगजननी वाला बनाना था , उसका समय आ गया ,तुम्हे कुछ विशेष करने की आवश्यकता पड़ेगी ही नहीं ! जिस प्रकार गति से चल रही गाड़ी को धक्का मारने की आवश्यकता नहीं होती! सो बच्चे निरंतर चल रही जीवन की गाड़ी का मालिक मैं शक्ति रूप पिता तुम्हे सीधा उसी और खींच कर लेकर जा रहा हु जिस ओर शक्ति ओर शान्ति निवास करती हैं! तेजपुंज शक्ति स्वरूप माँ आदिशक्ति से तुम्हे नया स्वरुप शक्ति का प्रदान करवाया जाना है ! बाकी रही बात तुम्हारे मन की कष्टकारी अवस्था की, बच्चे कभी चींटी पहाड़ को गिरा पायी है! या फूँक से पहाड़ को उडाते देखा है! नहीं न! तो फिर क्यों अपना मन डावाडोल किया तुमने ! बच्चे निर-अहंकारी और निस्वार्थ भाव से जी रही उस आत्मा को अपने हिसाब से जीने दो,तुम्हे कहीं कोई अपनी राय का दाखिला करवाने की आवश्यकता नहीं! तुम्हारा स्वयं का स्वाभिमान तुम्हे उन उचाइयों पर ले जाएगा जहाँ पर अमृत विजयी बनने का गौरव प्राप्त हुआ करता है! बच्चे जिसके कुंड में जो भरा होगा अमृत या विष ,वह उसी की और लुढ़कता चला जाता है! उसे बार बार धकेलने की आवश्यकता नहीं रहती ,बिल्कुल उसी प्रकार जिस प्रकार चुम्बकीय शक्ति से लोहा स्वयं चुम्बक की तरफ़ खिचने लगता है,उसे धकेलना नहीं पड़ता ! तो बच्चे मैं पिता शक्ति स्वरुप उसी चुम्बकीय शक्ति से अपने समान गुणों वाली आत्माओ को अपनी तरफ़ खींच लिया करता हु! उन्हें अलग से कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं रहती! यह सारा ब्रह्मांड इन्ही शक्तियों का भण्डार है! इसमें समाई शक्तियों को मानव शरीर के द्वारा ही खींचा जा सकता है! जिन्हें चलाने की शक्ति मानव शरीर में ही विद्यमान है! मात्र उन विधियों को अपनाना पड़ता है जिनसे शक्तियां खिंचनी प्रारंभ होती हैं! जिस प्रकार लकडियों का ढेर पडा हुआ है ,जलाने के लिए तिल्ली भी है लेकिन तिल्ली को घिसाने का जरिया माचिस न होने से आग जलाई जानी असंभव होगी, ठीक उसी प्रकार ब्रह्मांड में शक्तियां भी हैं ,उन्हें एकत्रित करने का जरिया मानवशरीर भी है ,लेकिन जब तक विशी को नहीं अपनाया जाएगा तब तक कुछ भी कर पाना असंभव होगा, सो बच्चे तुम्हे इस काम के लिए बार बार चेतावनी भी दी गयी लेकिन तुम्हे तो मूर्छा (सांसारिक प्र्वितियों का समावेश) आने लगी थी , तो मूर्छा तुम्हारी उडवानी थी इसीलिए तुम्हे इतनी जोर से झटकना और पटकना पडा की तुम्हारा मन क्षुब्ध होकर की यह तुम्हारे ही भले और कल्याण के लिए करना पडा तो काम में लगवाई गई जीवात्मा कसूर वार कैसे हुई! तुम्हे तुम्हारा काम और अवस्था याद करवाने के लिए इतना सारा बखेडा करना पडा! कसूर किसका था ,तुम्हारा या उस आत्मा का जिसे बेवजह तुम्हारा काम करना पड़ा! तो बच्चे समझो स्वयं की अवस्था को एवं तैयार हो जाओ अपने मूल रूप को पाने के किए ! तुम्हे कतई परेशान होने की आवश्यकता न पहले थी और न अब है ! तुम्हारा सारा काम पूर्णता को प्राप्त हो इसके लिए तुम्हे मन की विशमताओ के घेरे से स्वयं को निकालना होगा! अपार शक्ति की मालिक तुम आत्मा क्यो बेवजह उस अंगारे से स्वयं को झुलसाने पर अडी हो जिस अंगारे का तुम्हारे जीवन से कोई सरोकार है ही नहीं! मैं पिता तुम्हे जीवन की खुशहाली के लिए उस बगिया का एक फूल दे रहा हूँ जिस बगिया की महक स्वर्ग से भी अधिक आनंददायक हुआ करती है! बच्चे संभालो उस कृपा रुपी फूल को जिसका तुम्हारे पास आना ही तुम्हारे सौभाग्य का सूचक है! बच्चे मेरा अंश तो तुम हो ही , फिर कौन तुम्हे घिनौनी हरकतों से गिरा सकता है या तुम्हारा तिरस्कार कर रहा है! कौन तुम्हारी अवहेलना करके तुम्हे प्रताड़ना दे सकता है! बच्चे मेरी झोली में हीर मोती ही हुआ करते हैं और यही हीरे मोती मैं भेंट स्वरुप अपने बच्चों को दिया करता हूँ!तो तुम भी उन्ही हीर मोतिओं से स्वयं को सजी-सवरी समझो! एक हीरा ही जीवन को चमकाने में सक्षम होता है!तो तुम्हे तो मालिक बना दिया गया है उस हीरे की खान की , सो बच्चे स्वयं को नीच कहना तुम्हे शोभा नहीं देता ! तुम तो सर्वथा सुंदर सर्वगुण संपन्न सौभाग्य शाली वह आत्मा हो जिसे प्रदान सब कुछ किया गया होने पर भी मात्र वंचित इसलिए रखा गया की समय आने पर किवाड़ खोल दिए जायेंगे भाग्य का सूर्य उदय होगा ,चमकार निकलते ही भाग्य बदल जाएगा! चंदन के पेड़ होने पर भी जब राख के ढेर तुम्हे सौपे गए हो तो स्वयं का हिसाब राख जैसा ही तो तुम्हे लगना था ! जिस राख का कोई मोल नहीं होता उसे कौन चाहेगा! कोई नहीं! लेकिन समय बदलना तो सुनिश्चित है! फेरबदल इस प्रकार होगा की जिसे अब तक चंदन के पेडो के साए में बिठाया गया था उसे वहां से हटा दिया जाएगा और तुम्हारा अधिकार तुम्हे सौप दिया जाएगा! विदाम्ब्नाया रही अबतक की परिस्थिति की कि जो अब तक सुखो का उपभोग कर रहे थे उनके तांत्रिक विधान के हिसाब से समय का पैमाना ही ऐसा था ! लेकिन अब पैमाना पलट कर रख दिया जाएगा! अधिक गडबडी मचाने वाको कोई पहले दबोच लिया जाना है ,उसके बाद कार्यशैली के हिसाब से दंड उन्हें मिलते रहेंगे जिन्होंने काम में हिस्सा बढाया था! तो बच्चे लगन से तुम अपने आप में निश्चिंत रहो ! कीसे अपराधी को कौन सा दंड दिया जाना है यह तो भुगतने वालो की अवस्था ही बता देगी! तुम निडर बन कर जियो! डरने की तुम्हे जरूरत नहीं! तुम्हारा हिसाब संपरिवर्तन का चलने ही वाला है! उसे कोई रोक नहीं सकेगा! अपनी मर्ज़ी से भाग्य बदलने वालो की नाक में नकेल डालो देखना तुम! बच्चे समय की ही जरूरत थी जो इतना बड़ा झटका तुम्हे दिया गया!

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