ज्ञानवाणी-2(1997)
Saturday, September 6th, 2008सायकाल में अपने जीवन के रक्षक एवं पालनकर्ता परमशक्ति शिव स्वरुप महादेव शंकर
से जीवन को उत्तम कर्म में जुटाने हेतु उसके लिए परमोत्तम सहायक “तप” की श्रेष्ठ प्राप्ति
के लिए प्रार्थना की!
सुनो मुझ दिव्य शक्ति के श्रेष्ठ बच्चे, जिस प्रकार उत्तम फल पेड़ पर
लगा होने पर भी जब तक उसको प्राप्त नहीं किया जाएगा,तब तक उसका पेड़ पर होना या न होना एक ही
समान होगा !ठीक उसी प्रकार तुम आत्माओं को दिव्य शक्तिया तो मिली तो होती हैं लेकिन उन्हें
ढूंढ़ना या प्राप्त करना उसी प्रकार जरूरी होता है जिस प्रकार पेट भरने के लिए फल को खाना!
तो बच्चे फलो को पेड़ से उतारने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं,उसी प्रकार शक्तियों को
जगाने के लिए अलग-अलग विधियां प्रचलित हैं! जिस जीव को जो विधि आसान लगती है वह उसे अपनाता
है!आध्यात्मिक विधियाँ जीव को शक्ति के उन केन्द्रों tak ले जाती हैं जहाँ से जीव स्वयं को शक्ति संपन्न
अनुभव करता हुआ उन शक्तियों को अन्य तक पहुचाने में समर्थ हो जाता है. बच्चे जिस प्रकार पेड़ के तने पर
चढ़कर हर टहनी, जो फलो से लदी हुई है उस तक आसानी से पहुचा जा सकता है, ठीक उसी प्रकार जीव का
शरीर उन आध्यात्मिक एवं आंतरिक शक्तियों की प्राप्ति के लिए सहायक होता है! तने की मजबूती पेड़ पर निर्भर
करती है,अगर जड़ मजबूत होगी तो तना मजबूत होगा,उसी प्रकार शरीर की मजबूती आध्यात्मिक कार्यो के लिएमन पर निर्भर करती है ! मन में बल होगा तो शरीर को इन कार्य में लगाया जा सकेगा ! अन्यथा तो शरीर की
इन शक्तियों तक पहुच पाना उसी तरह असंभव होगा जिस प्रकार तने के टूटने से जीव नीचे गिर कर स्वयम को नुक्सान
पहुचायेगा सो बच्चे पेड़ के तने की मजबूती के लिए जड़ को जिस प्रकार भूमि,जलवायु,धूप की अति आवश्यकता होती
है आध्यात्मिक तेजी की,उसी के अनुसार वातावरण की एवं उसमें सहायक ज्ञान रुपी जल एवं स्थान की! सो बच्चे
वातावरण ,ज्ञान जल एवं स्थान तो बाह्य रूप से प्राप्त होते है, लेकिन “तेज़” को अन्दर से ही प्राप्त करना होता है! बाकी
सब के होते हुए तेज़ के na होने से वही हालत होती है जो धूप न मिलने पर पेड़ पोधो की होती है! अर्थार्त वे मुरझा कर गिर जाते हैं! तो बच्चे परम सहायक एवं परमोत्तम तेज़ को प्राप्त करने के लिए योगीजन “तप” का आश्रय लेते हैं! यह
तप दिव्य तेज़ को दिलवाने में सहायक होता है.इसी के बलबूते पर चलता हुआ जीव एक जनम में कई जन्मो का समावेश
करता रह कर अपना अंतिम लक्ष्य परम पद को प्राप्त कर ही लेता है !मन की साधना से लेकर शरीर की अनियमित क्रियाओं को अपने वश में करते रह कर जीव उस शक्ति के पुंज को प्राप्त करता है जो बाह्य जगत में विचरते सूर्य के समान प्रतीत होता है!यही स्वरुप है मुझ पिता का! सबसे ऊंची अवस्था होती है जीव की जब वह परमपद को प्राप्त करता है! इस से पहले कई सीढियां तय करनी पड़ती है.
सबसे पहले मन एवं शरीर को इस योग्य बनाना होता है कि वे काम में लग सकें शरीर के द्वारा(अर्थात इसमें होने वाली क्रियाओं का प्रभाव) मन पर कोई कुप्रभाव न पड़े इस बात का ध्यान रखना पड़ता है!इसके लिए मन को आत्मिक कार्यो में लगाये रखना अति आवश्यक होता है! आत्मिक कार्यो
में सात्विक वृत्तयो की आवश्यकता होती है! सात्विक वृत्तिया बनी रहे इसके लिए शरीर को मिलने वाले जल,वायु,स्थान एवं भोजन का शुद्ध एवं सात्विक होना अति आवश्यक होता है!शरीर को किस तरह का भोजन,जल ,वायु एवं स्थान प्राप्त होता है इस बात के लिए प्रयास करना ही
“तप” कहलाता है!मन की सोच शुद्ध होगी तो आगे का कार्य स्वतः ही चलता रहेगा!जीव को कुछ नहीं करना होता,जिस प्रकार मशीन को किसी प्रकार के बाह्य कूडे
करकट से बचाए रखकर,शक्ति सर्किट से जोड़ने के बाद वह मशीन बाकी का काम तो स्वयम करती रहेगी,उसमें कारीगर को कुछ करना नहीं होता! सो बच्चे आत्मा की
शक्तिया बाकी के काम स्वयम करती हैं अगर मन को विशुधता से बचाए रखा जाएगा !