ज्ञानवाणी-5 (1997)

सायं काल में अपने इष्ट देव महादेव से स्वयं को तप की उच्चतम अवस्था तक ले जा सकू इसके लिए प्रार्थना करके, जीवन के प्रति चल रहे अन्य आत्माओ के द्वारा विरोधात्मक प्रहार जिन्हें सहन कर पाना नामुमकिन होता जा रहा है तथा जीवन में हुए अन्याय को न्याय मिले, इसके लिए सबसे बड़े न्यायधीश पिता शिव से प्रार्थना की!
मुझ दीनवत्सल पिता के आज्ञाकारी बच्चे, तुम वही आत्मा हो जो अपने पूर्व जन्मो की पूँजी के बल पर अपने आने वाले कई-कई जन्मो के मार्ग अवरोधकों को हटाने की पूरी कोशिश में लगी हुई हो! बच्चे जिस प्रकार ऊँची चढाई चढ़ने वाला जीव अपने पास वे सब समान इकट्ठे करता है जिनकी सहायता से उसे हर तरह की मुसीबत का सामना करना होता है और बुद्धि की सहायता से वह उन्हें प्रयोग में लाता है,  ठीक उसी प्रकार मुझ पिता के द्वारा चलाया जा रहा जीव अपने शुद्ध मन के भावो से उच्च कर्म करते रह कर, वह पुण्य दाई राशि इकट्ठी करता है जो उसके दंड स्वरुप विघ्नों को हटाने में सहायक बनती है! सो बच्चे जो कर्म तुम करते हो या जो विघ्न तुम्हारे मार्ग में अन्य आत्माओ द्वारा खड़े किए जा रहे हैं ये तो खेल खेलने का एक तरीका ही समझो! कोई जीव अपने हिसाब से कुछ नहीं कर सकता! उस उस जीव को माँ सरस्वती के द्वारा वैसी ही बुद्धि प्रदान करवा दी जाती है जिस प्रकार का खेल मुझे खिलवाना होता है! इसी खेल में जीव के मन के भावो का समावेश होता रह कर नई नई कहानियाँ बनती रहती हैं! जीवो के मन के बुरे भाव उस कहानी को बुरा मोड़ देने वाले होते हैं! जिनका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ता ही है चाहे किसी भी रूप में! अच्छे भाव खेल पूरा होते ही जीव को बंधन मुक्त करवा देते हैं! लेकिन बच्चे यहाँ संख्या ऐसे जीवो की अधिक है जिनके मन के भाव पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण अशुद्ध हैं! उनका लेखा जोखा कई-कई जन्मो का समाप्त होने वाला नहीं है! कुछ पुण्यात्माएं पूर्व जन्मो की पूँजी के प्रभाव से अपना हिसाब पूरा करवाने में खरी उतरती हैं! इन आत्माओ को मुझ पिता द्वारा ऐसे अपना लिया जाता है जिस प्रकार खेल रहे बच्चे को घर वापिस ले जाने के लिए पिता गोद में उठा लेता है! इस समय पिता का सानिध्य, प्यार सब कुछ बच्चे पर होता है! बच्चा अगर पीछे का सब कुछ भुला कर पिता के कहने में रहेगा तो उसे सब कुछ मिल ही जाएगा! तो बच्चे तुम स्वयं को मुझ पिता की गोद में बैठे हुए समझो और जो हो चुका वह पीछे का खेल मात्र था, यथार्थ से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है अब तुम्हारा! सम्बन्ध होगा केवल उन जीवो को जिन्हें उस खेल के अनुसार दंड भुगतने पड़ेंगे! ये तो वे कांटे होते हैं जिन्हें उन्होंने अपने मार्ग में उन्होंने स्वयं बिछाया होता है और इन्हे चुगना भी मात्र उन्हें ही पड़ेगा! क्योंकि उस मार्ग पर वे ही खड़े होंगे! जिसके पैर में कांता चुभेगा उसे ही पीडा का एहसास होगा! और उसे ही दुःख भी भोगना पड़ेगा! तभी जीव को एहसास होगा अपने किए का! सो बच्चे अच्छे बुरे जो भी कर्म जीव करता है, उनका उस जीव के साथ वैसा ही सम्बन्ध रहता है जिस प्रकार अपने पिए जाने वाले पानी में तुम मीठा घोल रहे हो या कड़वाहट! अमृत घोल रहे हो या फिर विष! जो भी घुला है पीना तोह पड़ेगा ही, उस से छुटकारा नहीं हो सकता! सो बच्चे घूँट तो हर जीव हर पल भरता ही है! तभी स्वयं को सुखी या दुखी अनुभव करता रह कर वह अपनी आत्मा को उठता या गिराता है! सो बच्चे आत्मा के इसी उठाने या गिराने का हिसाब उसे न्याय के कटघरे में खड़ा करवाता है! इसमें किसी भी अन्य जीव को वह दोष नहीं लगा सकता! क्योंकि जिस पूँजी का मालिक वह होता है वही हालत उसकी आत्मा की बनती है! आत्मा को ही न्याय के कटघरे में आना पड़ता है! तो बच्चे गिरी हुई आत्मा को क्या कभी बरी किया जायेगा? नहीं! उसे उसी हिसाब से दंड सुना दिया जाएगा! फिर दंड भुगतना पड़ता भी साथ ही है! अगले जन्म का चक्कर कलियुग में नहीं होता! यहाँ साथ ही साथ कर्म, साथ ही साथ दंड और साथ ही साथ सहना होता है! सो बच्चे मुजरिम बने जीव संसारी आँखों से जो अब तक छुपते आ रहे थे वे मुझ पिता की तीसरी आँख से छुप नहीं सकेंगे! उन्हें जुर्म कबूल करके सूली पर चढाने जैसा दंड नसीब होगा! अब तक ना भागते तो शायद सूली के दंड से बच भी सकते थे! लेकिन होनी बलवान होती है! पूर्व जन्मो में राजा के घर नौकर होने से चोरी कर करके अपने मिलने वालो के घर भरे थे इन्होने सो वे वापिस लेने में लगे हुए हैं ये अब तक! अब हिसाब पूरा होने वाला है! न्याय का पलडा अवश्य झुकेगा! सो बच्चे पाप रुपी गाँठ को प्रायश्चित रुपी नोक से खोलने वाला जीव अवश्य अपना दंड कम करवा लेता है लेकिन उसे और भी मजबूत करने वाला एक न एक दबोचा ही जाता है! तुम्हे अपना काम याद रखना है ।बाकी के काम समय के अनुसार तुम्हे पूरे होते नज़र आयेंगे! तुम्हे अपने मार्ग में नज़र आ रहे जीवो के अवरोधों को अपने तपोबल से नष्ट करना होगा! इसके लिए कुछ विशेष नहीं करना होता! सेक के आगे कीट पतंगे अधिक देर तक टिक नहीं पाते उसी प्रकार मुझ पिता की कृपा प्राप्त आत्माएं भी उसी लौ की समान बन जाती है जिन्हें जगत की अन्य आत्माएं पार नहीं कर पाती! सो बच्चे मेरी नज़र में ऐसी आत्माओं का कोई मोल नहीं होता जो अन्य आत्माओ को कष्ट पहुचाती हैं! ऐसी आत्माएं उन जुगनुओं के समान होती हैं जो अंधेरे में चमकती अवश्य हैं परन्तु अन्य जीव आत्माओ को रौशनी नहीं दे सकती! और कुछ समय के बाद अपना अस्तित्व खो बैठती हैं! बच्चे तुम्हे अपनी योग शक्ति को बढ़ाना है इसी से सारे काम होंगे!

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2 Responses to “ज्ञानवाणी-5 (1997)”

  1. Kumar Chetan Sharma Says:

    This all is too hard to understand. I guess if there is some thing like God it must be very simple. Anyway, this is my thought. My opinion, can be wrong. But I feel this all must be so simple that even a school going kid can say, yes this is so true. Unfortunately you have to provide “vyakhaya” or explanation for anything that is knowledgeable. Ironically these texts are written for those who are already enlightened and who don’t need explanation.
    God and goodness is in simple things.
    Never the less, a good work. :-)

  2. meeru Says:

    Thanks for ur comments.
    I can understand the status of every reader if he/she has been reading “gyanvaani” for the first time.Readers are my real target and whatever i m doing is for them only. This is very true where ppl are indulge in materialistic living n merries, there they find God in simplistic manner.when sorrows and grieves surrounds them even when they fails to understand all happenings of life.Matter is so advance and we are in our starting stage to describe our “Gyanvaanies” and their aim.
    Eventually, reader would come to know what every “gyanvaani” want to describe.
    Thanks for ur valuable attention for reading this reply.
    wishes.

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