ज्ञानवाणी-3(1997)

रात्रि की अनुपम ज्ञान वेला में ज्ञान दर्शक पिता महादेव से मंगलमिलन मनाकर मन के प्रश्नों का उत्तर मांगने के लिए प्रार्थना की .
सुनो मुझ कल्याणकारी पिता के बच्चे ,उत्तम राह पर चलने से कल्याण होता है ,यह विदित बात है !
लेकिन चलना भी दो तरह का होता है ! एक शारीरिक और दूसरा आत्मिक ! जीव को जो अधिक उपयुक्त लगे उस पर चलने में ही भलाई होती है ! क्योंकि जो भाव जीव के बनेंगे वे उसके पूर्व जन्मो की पहुच के अनुसार ही बनेंगे ! जब जीव तन -मन से मार्ग पर चलने का मन बना लेता है तो उसे कहाँ से शुरू होना है और कहाँ से चलना है ,ये सब उसके मन के भावो में भर दिया जाता है !उसी ही साब से उसे सुविधायें भी मिल जाती हैं ! ये करम संसारी जीवो से करवाए जाते हैं उनके भावो की शुधि बनाये रखने के लिए ! जब भाव शुद्ध होकर जीव बाह्य मार्गो के जरिये यात्राएं पूरी करके अपने असली स्वरुप को पहचानने में सक्षम हो जाता है तो उसे आंतरिक यात्रा जिसे रूहानी या आत्मिक यात्रा कहा जातां है ,पूरा करने के लिए तैयार किया जाता है ! इस यात्रा को पूरा करने के लिए जीव को अपना हर करम मन -वचन से शुद्ध करते हुए रह कर प्रतिदिन भोग मुझे लगते रह कर ,स्वयं को हर फल से , उसके सुख -भोग से अछूता रखना होता है !बच्चे ,जिन जीवो की आत्मिक यात्राएं आरम्भ होनी होती हैं उनका बाह्य यात्राओं से कोई प्रयोजन नहीं होता ! उनका पल पल यात्रा में ही व्यतीत होने के समान होता है! बाह्य यात्रा करने वाले जिन शक्ति स्थलों की पूजा करने जाते हैं ,आंतरिक पूजा कर रहे जीवो को वे शक्ति स्थल स्वयं में ही मिल जाया करते हैं !जिस शक्ति के दर्शनार्थ जीव लम्बी -लम्बी यात्रें करते हैं ,वह शक्ति तो आंतरिक यात्रा पे चल रहे जीवो में साक्षात् दृष्टिगोचर होती है ! लेकिन उसे देखेगा वही जो उसे पहचानता होगा !मुझ पिता की आज्ञा से तुम अन्तर आत्मा अपना कार्य जारी रखो ! मुझ पिता की शक्ति हर पल तुम्हे मिल रही है इसे ग्रहण करते रह कर अपने स्थान को ही तपस्थली तुम्हे बनाना होगा ! सर्व देवो की इच्छा यही है की तुम्हे किसी बाह्य यात्रा पर जाने की आवश्यकता न अब तक ठी और न होगी ! जब जहाँ जाना होगा अकस्मात ही पंहुचा दिया जाएगा ,इसके लिए किसी विशेष प्रोयजन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ! मुझ पिता का संदेश ग्रहण करो ! सरोवर तुम्हारा मन है उसके खिले कमल तुम्हारे शुद्ध भाव ! जहाँ कमल है वहां विष्णु -लक्ष्मी जी का वास हुआ करता है ! सो बच्चे ! देवताओ का वास होता है हर जीव के स्वयं के भीतर ही लेकिन उन्हें जीव अपने अन्दर तो प्रतिष्ठित कर नहीं कर पाता क्योंकि भाव अशुद्ध रखता है और बाह्य यात्रा पर निकल पड़ता है ! सो बच्चे कोई देव शक्ति न बाहर थी न होगी ! उन्हें तो जीव को अपने भीतर खोजना होता है और उसी के लिए प्रयास करना होता है ! यही प्रयास यात्रा कहलाती है ! इसे ही पूरा करना होता है !

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