Archive for September 2nd, 2008

ज्ञानवाणी-1 (1997)

Tuesday, September 2nd, 2008

सुनो मुझ सृष्टि के रचयिता  के उत्तम बच्चे !

वैसे तो संसार में वही जीव सुखी है जिसके कर्म बंधन कट चुके हैं,लेकिन जब कर्म बंधन कट जाएँगे तो उसे वापिस बुला लिया जाएगा ,वह वहां रहेगा ही नहीं!तो इसका अर्थ यह हुआ के  कोई सुखी है ही नहीं!जो जो आत्मा जिस आत्मा के साथ रह कर हिसाब पूरा कर रही है,वहां मन के भावो  का गहरा प्रभाव एक दुसरे पर छोड़ कर उन्ही भावो के हिसाब से दुःख सुख का अनुभव करती है ! बच्चे !
कलियुग में उन्ही आत्माओ को भेजा जाता है जिनके पापकर्म अधिक होते है! पापों का भुगतान होगा तो सजा तो मिलेगी ही ! अगर जीव ज्ञानी होगा तो उस सजा को बिना किसी परेशानी के सहता रहेगा, किसी तरह का विकार उसके मन में नहीं पनपेगा और  वह आराम से कर्म के बन्धनों से मुक्त हो जाएगा !अन्यथा तो अज्ञानी जीव बदले की भावना से कुकर्म को अपनाएगा और जालो में स्वयं  को बाँध लेगा
! जिनके चंगुलो से बचने के लिए फिर जन्म जन्मान्तरों तक जूझना पड़ता है ! सो बच्चे पाप की वेदी पर चडी  हुई आत्माएं ही इस कलियुग का सहारा लेती हैं !कलियुग में मैं पिता स्वयम पढाने आता हू आत्माओ को !यही ब्रम्ह ज्ञान कहलाता है!जिसको जान लेने  के बाद उल्टे पथ पर चल रहा और मार्ग से भटका हुआ जीव स्वयं को संभालने में सक्षम हो जाता है!जो जीव आज परमपद को प्राप्त हो चुके हैं या जिनकी पूरी मेहनत चल रही है मेरी प्राप्ति के लिए ,वे ही ब्रम्ह ज्ञानी कहलाते हैं!सो बच्चे ज्ञान तुम आत्मा को भी मिल रहा है!
इसे अपने लक्ष्य में सहायक समझ कर अपना मार्ग निश्चिंत भाव से तय करते रहो !
तुम्हारा कई कई जन्मो का काम एक ही जन्म में पूरा हो,इस तरह से तुम्हे अनेक कामो में लगाया जा चुका है !अब बारी आती है तुम आत्मा के लिए विघ्न बन रहे नीरस जीवन की ! बच्चे यह नीरसता तुम्हे तुम्हारे जीवन में सहायता प्रदान करवाएगी !
तुम्हे जीवन को मात्र कर्म पथ ही समझना होगा! कर्म करते रहो! रस अभी खट्टा है,फीका है या कड़वा है इसकी चिंता मत करो !

तुम्हे गुण वृद्धि स्वयं की करनी है इस में क्या चीज सहायक है,वह तुम्हे तुम्हारी मुझ पिता के प्रति निष्ठां के फल स्वरुप ही प्रदान करवाई जा रही है !इसे निश्चिंत भाव से मुझ द्वारा दिया जा रहा प्रसाद समझो !बच्चे कहीं तुम्हारे गुण कहीं कम तो नहीं हो रहे! बस यही चिंता तुम्हारी होनी चाहिए! अन्य कोई आत्मा कौन सा  कर्म कर रही है इस बात की चिंता करने वाले तुम कौन हो!
कोई ठीक कर रहा है या नहीं इस बात को मैं स्वयम देखूंगा! तुम स्वयं का हिसाब उस अजनबी  सा समझो जिसे मात्र कर्म पूरे करने के लिए एक झुंड में बैठाया गया है!बाकी के जीव तुम्हारे लिए अजनबी ही हैं ! वो क्यों तुम्हारी परवाह करने लगे!
तुम्हे अपनी भूमिका याद होनी चाहिए!
अपने कर्म को शांत मन से बखूबी निभाते रहोगे तो परिस्थिति  चाहे जैसी भी आये तुम्हे कोई नुक्सान नहीं पहुचायेगी !
स्वयं को पहचानो ! अपना अस्तित्व गुणों का जानकर,गुणों  को बनाए रखने के लिए कर्म करते रहो,कर्म पूरे होते रहेंगे और गुणों का रस भी जीवन में समाता रहेगा!सो बच्चे कृपा की पात्र तो तुम हो ही,तभी तो ज्ञान माला में समाये उत्तम ज्ञान रुपी हीरे मोतियों को प्राप्त करके कृतार्थ  हो रही हो !बच्चे गुण बाटने से बढ़ते हैं इस बात को चरितार्थ करना है ! सो अपने जीवन का लक्ष्य यही बनाओ कि मन,वाणी और कर्म से जितना हो सके गुणों का ही बटवारा करना है ! जिस से ना जाने कितने गुणहीन आत्माएं स्वयं को गुणों से भरता अनुभव करते हुए इस अनुपम भेंट  की मालिक बन जाएँगी!यह भी उपहार ही होगा तुम आत्मा की तरफ से उन के लिए! तो उपहार देने वाला उत्तम ही कहा जाता है ! तो बच्चे कर्म की पूर्ती का सबसे उत्तम तरीका यही है की उत्तम गुणों का बटवारा करते रहकर अपने जीवन को उत्तम रसों से भरपूर करो !बच्चे तुमने जीवो को शिवलिंग की स्थापना करके उसकी पूजा करते देखा होगा ! पांच प्रकार के अभिषेको से पूजा की जाती है ! दूध ,दही,मधु,गंगाजा ,खीर! संसारी जीव संसारी चीजो से ये सब तैयार करते हैं! लेकिन मुझे प्राप्त होने के लिए तत्पर जीव यथार्थ को जान कर आत्मिक गुणों से यह काम करते हैं! यही क्रिया मुझे करवानी होती है ! यदि कोई भी काम बखूबी करना है तो अपना कोई भी गुण नष्ट होने से स्वयम को बचाना होगा!स्वयं के खजाने स्वयम ही भरने होते हैं! इन्ही खजानों के मालिक मुझ पिता का अपने बच्चे को यथार्थ की पूर्ती के लिए वरदान !

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